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प्राण का प्रवाह कम होने पर शरीर रोगमय हो जाता है: डॉ. जायसवाल

Thu, 18 Apr 2019 11:35 PM IST
बृजमोहन बृजमोहन अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा
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एसएसजे परिसर अल्मोड़ा में आयोजित कार्यशाला में योग सीखते प्रतिभागी। - फोटो : AMAR UJALA
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 एसएसजे परिसर अल्मोड़ा के योग शिक्षा विभाग की ओर से योग विभाग में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का चिकित्सकीय अनुप्रयोग विषय पर आयोजित दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के पांचवें दिन प्राण चिकित्सा विधि से रोगियों का उपचार किया गया। प्राण चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. ऊषा जायसवाल और डॉ. राकेश जायसवाल ने प्रतिभागियों को प्राण चिकित्सा का प्रशिक्षण दिया। 
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 डॉ. ऊषा जायसवाल ने कहा कि प्राण का प्रवाह कम होने पर शरीर रोगमय हो जाता है। उन्होंने बताया कि शरीर दो प्रकार का होता है। जीवद्रव्य शरीर और भौतिक शरीर।  रोग होने की अवस्था में पहले जीवद्रव्य शरीर में रोग प्रभाव डालते हैं तब भौतिक शरीर में रोग होते हैं। प्राण चिकित्सा करने की प्रक्रिया में पहले जीवद्रव्य शरीर की चिकित्सा करनी पड़ती हैै। प्राण चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. राकेश जायसवाल ने कहा कि प्राण चिकित्सा पद्धति एक दिव्य अलौकिक प्रक्रिया है। जिससे हम अपने आभा मंडल को बढ़ा सकते हैं। कार्यशाला संयोजक डॉ. नवीन चंद्र भट्ट ने बताया कि 19 अप्रैल को नवयोग चिकित्सा के बारे में प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया जाएगा। कार्यशाला में डॉ. प्रेम प्रकाश पांडेय, डॉ. लल्लन कुमार सिंह, डॉ. आशा राणा, हेमलता अवस्थी, विरेंद्र सिंह, मनोज गिरी, सुमित चौधरी, दीपिका अधिकारी, चंदन सिंह आदि मौजूद थे। 
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