कौसानी और इसके आसपास की पहाड़ियों पर आजकल बुरांश के फूल खिल रहे हैं। सदाबहार पेड़ों की हरियाली के बीच बुरांश के सुर्ख फूलों की खूबसूरती देखते ही बन रही है। कौसानी में प्रकृति की इस धरोहर से महान छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत इतने प्रभावित हुए कि उन्होेंने बुरांश को जंगल में अद्वितीय बताए हुए कुमाउंनी भाषा में कविता लिख डाली, और कहा, सारे जंगल में त्वे जस क्वे न्हां रे क्वे न्हां।
कौसानी समेत इसके सामने स्थित बिनसर, ऐड़द्यो आदि स्थानों पर बांच, देवदार, बुरांश, चीड़ के मिश्रित वन हैं। अधिकतर स्थानों पर लाल रंग का बुरांश होता है। भटकोट क्षेत्र की पहाड़ियों पर सफेद फूलों वाला बुरांश भी होता है। कौसानी लाल रंग के बुरांश के लिए विख्यात है।
प्रख्यात छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने प्रकृति के सौंदर्य से प्रभावित होकर ही काव्य रचना की। उन्हें हिंदी के छायावादी कवि के रूप में ही जाना जाता है लेकिन लाल बुरांश की छटा से वह इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने कुमाऊंनी भाषा में भी कविता लिखी- सारे जंगल में त्वे जस क्वे न्हां रे क्वे न्हां, फुलन छै के बुरांश, जंगल जस जलि जांछ। सल्ला छू द्यार छू पयां छू अंयार छू सबनाक डालन में पुंगनक भार छू, तैमें दिलैकि आग, त्वै में जवानिक फाग। अर्थात सारे जंगल में तेरे जैसा कोई नहीं है, तू फूलता क्या है कि जैसे जंगल ही जल जाता है। चीड़, देवदार, पद्म, अयार भी हैं लेकिन यह शाखाओं के भार से ही लदे हैं, लेकिन तुझमें दिल की आग है, यौवन का रस है।
कौसानी के बुरांश को पर्यटन विकास के साथ जोड़ने के लिए बृहस्पतिवार से शुरू हुआ बुरांश महोत्सव सैलानियों के नए किस्म का कार्यक्रम है। प्रकृति से लगाव रखने वाले इससे प्रभावित होंगे।