स्याल्दे (अल्मोड़ा)। स्याल्दे के सात से अधिक गांवों में पेयजल संकट गहराने लगा है। मोहणा पंपिंग योजना से जुड़े इन गांवों में लोगों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में ग्रामीण दो से तीन किमी दूर से प्राकृतिक जल स्रोतों की दौड़ लगाने को मजबूर है। ऐसे में 2500 से अधिक की आबादी को पानी का पानी नसीब नहीं हो रहा है।
स्याल्दे में लोगों को पेयजल संकट से निजात देने के लिए मोहणा पंपिंग योजना बनाई गई। योजना के तहत कंहौणी, रोटापानी, कैहड़गांव, कलाझिपा जोशी, मोहणा, गौरखेत, लमकांसौ आदि गांवों को जोड़ा गया। लोगों को उम्मीद थी कि अब उन्हें पेयजल संकट से निजात मिलेगी। लेकिन पंपिंग योजना से जुड़े इन गांवों में लोगों को तीसरे दिन पानी मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से पुरानी पाइपलाइन और उपकरण जर्जर हो चुके हैं। कई जगह पाइप लीक हो रहे हैं, जिससे जल आपूर्ति बाधित हो रही है। इस संबंध में जल संस्थान के अधिकारियों को कई बार सूचित किया गया, लेकिन अब तक कोई उचित कार्रवाई नहीं हो सकी है। इससे ग्रामीणों में आक्रोश है।
बोले जिम्मेदार
मोहणा पंपिंग योजना से जुड़ी पेयजल लाइन के पंप सहित अन्य उपकरण जर्जर हो चुके हैं, जिससे समस्या बनी हुई है। जल्द लाइन में नए पंप लगाकर जलापूर्ति सुचारु करने के प्रयास किए जा रहे हैं। -कैलाश जोशी, एई जलसंस्थान मासी।
जल जीवन मिशन के तहत मोहणा पंपिंग योजना में नये पंप, पाइप और अन्य उपकरण लगाए जा रहे हैं। अभी तक करीब 3.5 किमी पाइपलाइन बिछाई जा चुकी है, शेष 1.5 किमी कार्य जल्द पूरा किया जाएगा। दो महीने के भीतर पूरी योजना चालू करने का लक्ष्य है।- महेंद्र कुमार जेई जल निगम।
बोले ग्रामीण
एक ओर मानसून काल चल रहा है दूसरी ओर हमारे क्षेत्र में पेयजल का संकट बना हुआ है। लंबे समय से पेयजल आपूर्ति को सुचारू करने की मांग की जा रही है। इसके बाद भी जल संस्थान और जल निगम को ग्रामीणों का दर्द नहीं दिख रहा है। - रमेश पपनोई, ग्रामीण
गांव में हर तीसरे दिन पानी आना अब आम बात हो गई है। गर्मी में हालात और बिगड़ गए हैं। बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा दिक्कतें हो रही है। पूरा दिन पानी जुटाने में लग जाता है। इससे जरूरी काम नहीं हो पा रहे हैं। -संतोष पाल, ग्रामीण
मोहणा योजना के तहत पानी तो आ रहा है, लेकिन पाइपलाइन लीक होने और पुराने पंपों के कारण सही सप्लाई नहीं हो पा रही है। कई बार अधिकारियों को बताया, लेकिन सब सुनकर भी चुप हैं। - बालम मनराल, ग्रामीण।