अल्मोड़ा में जलवायु परिवर्तन की कार्यशाला
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मौसम परिवर्तन के कारण एक तरफ हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वैज्ञानिक भी यह मान रहे हैं कि डेंगू और अन्य वायरस जनित बीमारियां जलवायु परिवर्तन की ही देन हैं। नए-नए वायरस आ रहे हैं, लेकिन इन सबसे निपटने के लिए हमारे देश में अभी तक तैयारी नहीं है।
जीबी पंत हिमालय पर्यावरण विकास संस्थान में बृहस्पतिवार को क्लाइमेट चेंज पर शुरू हुई कार्यशाला में उत्तराखंड विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) के महानिदेशक डॉ. राजेंद्र डोभाल ने कहा कि भारत में जैव विविधता अधिक होने के कारण यहां क्लाइमेट चेंज का ज्यादा असर दिखाई पड़ता है। उत्तराखंड में हाल में ही डेंगू के बढ़ते प्रभाव का जिक्र करते हुए डोभाल ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि डेंगू का प्रभाव अब पूरे साल भर दिखाई दे। यह भी संभव है कि डेंगू बिल्कुल ही खत्म हो जाए। यह भी हो सकता है कि डेंगू खत्म होकर कोई नई बीमारी का प्रकोप सामने आ जाए।
उन्होंने कहा कि डेंगू की बीमारी भी क्लाइमेट चेंज की ही देन है, क्योंकि यहां का मौसम डेंगू मच्छर के पनपने के लिए मुफीद है। डोभाल के मुताबिक डेंगू का मच्छर ढाई फुट से ऊपर नहीं उड़ता है। अब डेंगू के मच्छर बिजली के पोल और फ्रिज के पीछे भी पनप रहे हैं।
अगर नारियल तेल को ही शरीर पर लगा दिया जाए तो मच्छर नहीं काटेगा। उन्होंने कहा कि बरसात का मौसम खत्म होने पर यहां स्वाइन फ्लू भी दिखाई पड़ सकता है और अगले मौसम में फिर कोई दूसरा वायरस आ सकता है। अमेरिका सहित कई देशों में इतनी जैव विविधता नहीं है। इसी कारण वहां कीड़े-मकोड़े आदि नहीं दिखाई पड़ते।
डा. डोभाल ने बताया कि डेंगू का मच्छर अब साफ पानी के साथ ही गंदे पानी में भी पनपने लगा है। मौसम परिवर्तन के कारण यहां आए दिन नए-नए वायरस सामने आते हैं और आते रहेंगे, लेकिनइनसे निपटने के लिए अभी हमारे पास कुछ खास संसाधन नहीं हैं।
अगर यह स्थिति पश्चिमी देशों में होती तो वहां तमाम वैक्सीन खोज लिए गए होते। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में कुल 1469 ग्लेशियर हैं, लेकिन अब तक सिर्फ 14 ग्लेशियरों पर ही अध्ययन किया जा सका है। हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियरों की स्थिति पर अच्छा अध्ययन किया जा रहा है। कहा कि केदारनाथ की त्रासदी चोटी के ऊपर बनी झील से नहीं, बल्कि अचानक हुई भारी बरसात के कारण हुई।