अल्मोड़ा के धीरेंद्र कुमार पांडे।
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पहाड़ में बहुतायत में पाया जाने वाले चीड़ का बगेट (छाल) भले ही लोगों के लिए निष्प्रयोज्य हो, लेकिन धीरेंद्र कुमार पांडे के हाथों में ऐसा हुनर है कि वह बगेट से सुंदर कलाकृतियां बना देते हैं। उनके द्वारा बनाई गई कलाकृतियों को देखकर विश्वास ही नहीं होता है कि यह चीड़ के बगेट से बनाई गई हैं। कलाकृति के जरिए वह राज्य की हस्तशिल्प कला को विश्व में पहचान दिलाना चाहते हैं।
अल्मोड़ा के त्यूनरा निवासी धीरेंद्र कुमार पांडे को बचपन से ही पेंटिंग बनाने का शौक रहा है। नौकरी के दौरान ही उनका रुझान वुडन क्राफ्ट की हो गया। उनके हाथों में ऐसा हुनर है कि वह चीड़ के बगेट को सुंदर कलाकृतियों में ढाल देते हैं। उन्होंने बगेट से लार्ड बुद्धा, मां नंदा-सुनंदा, भगवान गणेश समेत कई कलाकृतियां बनाई हैं। हाल में ही उन्होंने योग कर्मसु कौशलम, देवालयों को संरक्षित करें, काटे गए वृक्षों का दर्द शीर्षक से नई कलाकृति बनाई है। योग कर्मसु कौशलम कलाकृति में उन्होंने कार्य को कुशलता से करना ही योग है का संदेश दिया है।
उन्होंने कहा कि देवालय हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर हैं। यह लोगों की अपार आस्था के केंद्र भी हैं। आने वाली पीढ़ी के लिए इन्हें संरक्षित करना होगा ताकि वह अपनी धरोहरों को देखकर गौरवान्वित हो सकें। वृक्षों के अंधाधुंध कटान से पांडे व्यथित हैं। काटे गए वृक्षों का दर्द शीर्षक से बनाई गई कलाकृति में उन्होंने इसे जीवंत रूप में दर्शाया है। उन्होंने इस कलाकृति में वृक्षों का दर्द और इन्हें बचाने का संदेश दिया है। वह पिछले तीन वर्षों से चीड़ के बगेट से कलाकृति बनाने का काम कर रहे हैं।
खास बात यह है कि पांडे कलाकृतियों में मानवीय संघर्ष, पर्यावरण, नारी शिक्षा, सशक्तीकरण, पलायन आदि मुद्दों को प्रमुखता से दर्शाते हैं। वह कलाकृतियों के माध्यम से पश्चिमी सभ्यता की अंधी दौड़ में शामिल युवा पीढ़ी को सकारात्मक संदेश देना चाहते हैं। उनकी दिली इच्छा है कि आने वाले समय में वह अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी आर्ट गैलरी में लगाएं। उन्होंने कहा कि सरकारों ने हस्तशिल्प कला को बढ़ावा दिया तो राज्य में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
एक कलाकृति बनाने में लग जाते हैं चार दिन
कलाकृतियां बनाने के लिए धीरेंद्र कुमार पांडे जंगलों और अन्य स्थानों से बगेट खुद लाते हैं। घर में चीड़ के बगेट से विभिन्न कलाकृतियों का निर्माण करते हैं। उन्होंने बताया कि एक कलाकृति को बनाने में तीन से चार दिन तक लग जाते हैं। बगेट से कलाकृति बनाना कम खर्चीला है। इसके बावजूद लोगों का रुझान इस ओर कम है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार युवाओं को प्रारंभिक प्रशिक्षण के साथ ही तैयार सामान की बिक्री की व्यवस्था करे तो काफी हद तक लाभ मिल सकता है।