संस्कृति के साधक
7 सितंबर 1946 को अल्मोड़ा के चितई के पास पेटशाल गांव में जन्मे जुगल किशोर पेटशाली ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत 1990 में लिखी किताब राजुला मालूशाही से की। यह पुस्तक 15वीं शताब्दी की अमर प्रेम गाथा पर आधारित थी। इसे बाद में उन्होंने संगीत नाटिका के रूप में तैयार किया। दूरदर्शन ने इसका फिल्मांकन कर देश-दुनिया तक पहुंचाया। इसके लिए उन्हें जयशंकर प्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पारंपरिक धुनों को सहेजा
पेटशाली ने कुमाऊंनी लोकगीत और धुनों पर गहन शोध किया। उन्होंने 34 पारंपरिक धुनों जैसे छपेली, चांचरी, झोड़ा, न्योली, भगनौल, बैर और जागर को संजोते हुए अपनी रचनाओं में स्थान दिया। उनकी रचनाएं बताती हैं कि वे लोक से कितने गहराई से जुड़े हुए थे।
पेटशाली का रचना संसार
पेटशाली के नाटकों में लोकगाथाओं की जीवंत झलक दिखाई देती है। राजुला-मालूशाही गीत-नाटिका में भोट प्रदेश की राजुला और बैराठ के राजकुमार मालूशाही का प्रेम अमर हो गया। जय बाला गोरिया नाटिका में गढ़ी चंपावत की रानी कालिंगा की पीड़ा सामने आती है। अजुवा-बफौल नाटक में बफौल भाइयों की वीरता का वर्णन है। नौ-लखा दीवान नाटक में भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय के खिलाफ उठे प्रतिकार को स्वर दिया गया है। कुमाऊंनी बोली-भाषा की ठसक और पारंपरिक लोक धुनों ने उनके नाटकों को एक अलग ही पहचान दी। पेटशाली अब तक 18 से अधिक पुस्तकें लिख चुके थे। उनकी अन्य कृतियों में कुमाऊं के संस्कार गीत, बखत, उत्तरांचल के लोक वाद्य, कुमाऊंनी लोकगीत, पिंगला भृतहरि, कुमाऊं की लोकगाथाएं, गोरी प्यारो लागो तेरो झनकारो, भ्रमर गीत, मेरे नाटक, जी रया जागि रया, गंगनाथ-गीतावली, विभूति योग और हे राम जैसी कृतियां प्रमुख हैं। उनकी कई रचनाओं का आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रसारण हुआ और अनेक नाटकों की सफल मंचीय प्रस्तुतियां भी हुईं।