बागेश्वर। पलायन की मार तुषरेड़ा गांव का अस्तित्व संकट में है। जिला मुख्यालय से करीब 60 किमी दूर बागेश्वर और पिथौरागढ़ की सीमा पर बसे इस गांव में पहले 40 परिवार रहते थे। गांव में अब मात्र 20 ही परिवार रह गए हैं। रोजगार की तलाश गांव के अधिकांश युवा बाहर को पलायन कर चुके हैं। गांव में अब अधिकतर अशक्त लोेग ही रह गए हैं।
यह गांव आज तक सड़क से नहीं जुड़ सका है। ग्रामीणों को नमक जैसे जरूरी वस्तु के लिए पांच किमी की खड़ी चढ़ाई पार करके पिथौरागढ़ जिले के बेड़ीनाग की दौड़ लगानी पड़ती है। ग्रामीणों को सबसे ज्यादा परेशानी तब आती है जब गांव में कोई बीमार पड़ जाता है। उपचार के लिए डोली में बैठाकर उसे अस्पताल तक लाने ग्रामीणों के पसीने छूट जाते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि राजनीतिक दलों के लोग गांव में सिर्फ वोट मांगने ही आते हैं। इस बार के चुनाव में भी राजनेता कई आश्वासन देकर गए हैं।
सेवानिवृत्त पुलिस कर्मी रतन सिंह धानिक ने बताया कि शासन-प्रशासन की उदासीनता के कारण गांव के लोग काफी परेशान हैं। राजनेताओं को तो गांव की याद सिर्फ चुनाव के दौरान ही आती है। गांव को आज तक तक सड़क से नहीं जोड़ा जा सका है।
चनुली भंडारी कहती हैं अधिकांश घरों के बेटे रोजी रोटी के लिए बाहर हैं। गांव में सड़क के साथ ही स्वास्थ्य सुविधा भी नहीं है। गांव में किसी के बीमार पड़ने पर उसे उपचार के लिए पांच किमी की चढ़ाई पार करके बेड़ीनाग जाना पड़ता है। डोली में बैठाकर ले जाने वाले युवक बमुश्किल ही मिल पाते हैं।
पूर्व प्रधान हरक सिंह कहते हैं कि नेता उनी भोट भोट कुनी रोड क्वै नि दीन यानि नेता आते हैं वोट की बात करते हैं जीतने के बाद सड़क नहीं बनाते हैं। सड़क न होने से गांव का विकास ठप पड़ा है। गांव में उत्पादित अनाज, शब्जी , दूध बाजार तक नहीं पहुंच पा रहा है।
पदम सिंह कहते हैं कि विकास के तमाम दावों के बावजूद गांव को सड़क से नहीं जोड़ा गया है। गांव में शिक्षा, बिजली और पीने के पानी की हालत भी खस्ता है। विकास के नाम पर आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं। सिंचाई के साधन की नगण्य हैं। सरकार की योजनाओं का लाभ मिलना तो दूर अधिकारी भी गांव में नहीं आते हैं।