अल्मोड़ा का एक पान व्यापारी ग्राहकों के इंतजार में।
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1967 में आई फिल्म तीसरी कसम का वो गाना पान खाए सैंया हमारो, सांवली सूरतिया होठ लाल लाल... आज भी नौजवान और आम लोगों के बीच खासा लोकप्रिय है। आशा भौसले के गाए इस गाने के बाद देश में पान खाने वालों के साथ ही पान का व्यापार भी काफी ज्यादा मात्रा में बढ़ता गया, लेकिन नोटबंदी के बाद से पांच से आठ रुपए तक बिकने वाले पान के व्यापार में भी तीस प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि शौकीन नोटबंदी के बावजूद उधारी में पान खाने से नहीं चूक रहे हैं।
हर गली नुक्कड़ पर खुली पान की दुकान एक ऐसा राजनीतिक और सामाजिक अड्डा है जहां लोग पान का रस निगलते और पीक थूकते हुए स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ देश के आर्थिक और राजनीतिक हालातों पर चर्चा करते दिखाई देते हैं। हर ग्राहक के टेस्ट की जानकारी रखने वाला पनवाड़ी भी ग्राहक को पान पेश करते हुए वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था पर मुस्कराते हुए लच्छेदार चर्चा कर अपनी ओर बरबस खींच लेता है। शौकीन ज्यादा होने से पूरे पहाड़ में पान की अनगिनत दुकानें सुबह से देर सायं तक खुली रहती हैं।
कोलकाता से आने वाला पान हल्द्वानी बाजार से होते हुए पहाड़ की मंडियों में हर रोज पहुंचता है, लेकिन नोटबंदी के बाद से पान के व्यापार पर भी असर पडना शुरू हो गया। मिलन चौक में पान की दो प्रसिद्ध दुकानें हैं। जहां हर रोज सुबह से देर सायं तक सैकड़ों लोग पान का स्वाद लेने पहुंच जाते हैं। इनमें अधिकारी, कर्मचारी, आम जन और दैनिक मजदूरी करने वाले शामिल हैं। 1976 से बाप-दादा की पान की पुस्तैनी दुकान चला रहे मिलन कुमार वर्मा बताते हैं कि नोटबंदी के बाद से पान के व्यापार पर करीब 30 प्रतिशत की कमी आई है। पहले वह तीन ढोली (एक ढोली में 200 पत्ते) मंडी से उठाते थे, लेकिन नोटबंदी के बाद से ग्राहकों की संख्या में कमी आई है जिस वजह से अब करीब डेढ़ ढोली पान ही वह मंगा रहे हैं। मामू नाम से फेमस वर्मा जी ने बताया कि छठ पर्व में घर गए बिहारी मजदूर भी नोटबंदी के कारण काम पर वापस नहीं लौटे हैं इससे भी काफी फरक पड़ा है। खैर पान का व्यापार भले ही कम हो लेकिन पान का स्वाद आज भी बेस्वाद नहीं हुआ है। शौकीन लोग उधारी या किसी और तरह पान का स्वाद ले ही रहे हैं।