जिले में रेशम उत्पादन की काफी संभावनाएं हैं। पिछले पंद्रह सालों में रेशम उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कोई खास काम नहीं हुआ है। जिससे रेशम उत्पादन आज तक ग्रामीणों की आय का जरिया नहीं बन पाया है।
कलस्टर विकास योजना के बंद होने के बाद विभाग को पिछले दो साल से बजट नहीं मिल रहा है। जिससे रेशम उत्पादन क्षेत्रों का विस्तार नहीं हो पा रहा है। विभाग अब मनरेगा के माध्यम से जिले में रेशम उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है।
जिले के सोमेश्वर घाटी के अलावा जैंती, लमगड़ा, स्याल्दे घाटी और हवालबाग ब्लाक के खूंट आदि क्षेत्रों की जलवायु रेशम उत्पादन के लिए उपयुक्त है।
पूर्व में कलस्टर विकास योजना में विभाग काश्तकारों को 45 हजार रुपये कीट पालन गृह, 18 हजार की कीट पालन सामग्री और 5500 रुपये के शहतूत के पौध उपलब्ध कराता था, लेकिन वित्तीय 2012-13 के बाद विभाग को बजट नहीं मिला है।
विभाग ने कलस्टर विकास योजना से सोमेश्वर घाटी के मल्ला खोली, अर्जुन राठ, भानाराठ, बैगनियां, सूपाकोट, मिरई के अलावा जैंती और अन्य क्षेत्रों ग्रामीणों को रेशम उत्पादन से जोड़ा है।
जिले में करीब ढाई सौ एकड़ क्षेत्र में शहतूत के पौधों का रोपण हुआ। प्रतिवर्ष मात्र 25 क्विंटल रेशम उत्पादन हो रहा है। रेशम के कोकून का बाजार मूल्य 250 से 300 रुपये प्रति किलो है।
उत्तराखंड कोआपरेटिव फेडरेशन प्रेमनगर ग्रामीणों से कोकून खरीदता है। पर्वतीय क्षेत्र में काश्तकार साल में रेशम की दो फसल ले सकते हैं।
एक हेक्टेयर में रोपित 300 शहतूत के पौधों से काश्तकार साल में 15 से 20 हजार रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित कर सकता है। पर पिछले दो साल से विभाग को बजट नहीं मिलने से जिले में रेशम उत्पादन को गति नहीं मिल पा रही है।
सहायक निदेशक रेशम अरविंद पांडे ने बताया कि विभाग अब ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा योजना के माध्यम से शहतूत के पौधों का रोपण करवा रहा है।
आगामी जिला योजना में 44 लाख रुपये का प्रस्ताव किया गया है। इससे स्याल्दे, सोमेश्वर, जैंती, ढौरा आदि क्षेत्रों में शहतूत के पौधों का रोपण किया जाएगा।
रेशम विभाग ने खूंट के समीप आधारमाफी गांव में वन पंचायत की सात एकड़ भूमि में रेशम उत्पादन के लिए फार्म स्थापित कर दिया है।
यहां शहतूत के आठ सौ पौधे रोपित किए गए हैं। 2018 से यहां रेशम उत्पादन शुरू होगा। इससे स्थानीय लोगों को जहां रोजगार मिल सकेगा वहीं ग्रामीण रेशम उत्पादन से भी जुड़ सकेंगे।