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कुमाऊं में भी मिलेगा गुणकारी मेघालयी काफल का स्वाद

Fri, 25 Nov 2016 11:45 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, रानीखेत (अल्मोड़ा)।
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रानीखेत में लगेगा मेघायल का पौधा - फोटो : अमर उजाला
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। सब कुछ ठीक रहा तो कुछ सालों के भीतर कुमाऊं क्षेत्र में काफल की नई प्रजाति विकसित हो जाएगी। अनुसंधान वन क्षेत्र कालिका की तरफ से मेघालय (शिलांग) के काफल को यहां प्रयोग के तौर पर उत्पादित किया जा रहा है। बूबूधाम, झूलादेवी, बिनसर, सौनी सहित कई स्थानों पर इस प्रजाति के पांच सौ पेड़ों का रोपण किया गया है। पौष्टिक फल जहां हृदय रोग के लिए, तो पेड़ की छाल से बना चूर्ण दमा, जोड़ों के दर्द के लिए रामबाण औषधि मानी जा रही है।
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उत्तर पूर्व क्षेत्र के काफल का वानस्पतिक नाम माईरिका ऐपिडा है। स्थानीय काफल की अपेक्षा यह काफल लीची के दाने के बराबर होता है, इसकी गुठली काफी छोटी होती है, जबकि पेड़ मध्यम आकार का और सदाहरित रहता है। इसकी छाल बादामी रंग की होती है। छाल में ग्लाइकोसाइड्स, शर्करा प्रोटीन, एमिनो अम्ल, कैल्शियम, आयरन, जिंक आदि तत्व पाए जाते हैं। रेंजर आशुतोष जोशी ने बताया कि छाल से बना चूर्ण गंभीर बीमारियों के लिए लाभदायक होता है।

शरीर में फोड़े, घाव होने पर इसका चूर्ण का प्रयोग होता है। चूर्ण को सूंघने से सिर का दर्द गायब हो जाता है। इसकी छाल से तेल भी निकाला जाता है जो जोड़ों के दर्द की रामबाण औषधि है। प्रयोग के तौर पर वह इस काफल को शिलांग से लाए हैं, रानीखेत क्षेत्र में फिलहाल 500 पेड़ों का रोपण किया गया है। द्वारसौं कक्षा संख्या 16, बिनसर महादेव, झूलादेवी आदि क्षेत्रों में पौधे रोपे गए हैं, इसका संरक्षण भी वन अनुसंधान केंद्र कर रहा है। 
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