बागेश्वर। धनतेरस से शुरू होने वाले दीपावली पर्व के आखिरी दिन यम द्वितीया या भाईदूज का त्योहार मनाया जाता है। भाई और बहन के प्रेम के प्रतीक इस पर्व में च्यूड़े का बड़ा महत्व है। आज मनाए जाने वाले भाईदूज के लिए जिले के ग्रामीण अंचलों में लोगों ने च्यूड़े कूटे।
यम द्वितीया पर्व के दिन भाई अपनी बहन के घर जाते हैं। बहन उनका स्वागत सत्कार कर उनके सिर पर च्यूड़े रखती हैं। भाई अपनी बहन को सुरक्षा का वचन देते हैं। यम द्वितीया के दिन काम आने वाले इन च्यूड़ों को गोवर्धन पूजा के दिन तैयार किया जाता है। पारंपरिक तरीके से च्यूड़े बनाने के लिए एक दिन पहले से धान को भिगोया जाता है। दूसरे दिन धान को पहले कड़ाई में भूना जाता है। ओखली में इसे कूटने के बाद च्यूड़े तैयार किए जाते हैं। वर्तमान में बाजार में मशीन से बने च्यूड़े भी उपलब्ध हैं, लेकिन ग्रामीण अंचलों में आज भी लोग ओखली में च्यूड़े कूटने को प्राथमिकता देते हैं। दीपावली के बाद तक भी इन च्यूड़ों को खाया जाता है।
यम द्वितीया पर्व को लेकर प्रचलित कथा
यम द्वितीया पर्व को लेकर प्रचलित लोक कथा के अनुसार सूर्य भगवान की पत्नी संज्ञा की दो संतान थी। यम और यमुना। संज्ञा सूर्य का ताप सहन नहीं कर पाई तो उसने अपनी बहिन संध्या को सूर्यलोक में बुलाया। संध्या को वहां छोड़कर वह स्वयं उत्तरी ध्रुव में रहने लगी। संध्या ने यमुना के साथ सौतेला व्यवहार किया जिससे यमुना दुखी रहने लगी। यम से अपनी बहन की हालत देखी नहीं गई तो उन्होंने यमपुरी नामक नया नगर बसाया और वहां जाकर रहने लगा। यमुना भी सूर्य लोक छोड़ भूलोक में आ गई और नदी रूप में रहने लगी। एक बार यमराज को यमुना की याद आई। वह उन्हें खोजने निकल पड़े। भूलोक में उनकी भेंट यमुना से हुई। यमुना ने उसका स्वागत सत्कार कर भोजन कराया। बहन से प्रसन्न होकर यम ने वरदान मांगने को कहा। यमुना ने कहा कि जो भी मेरे जल में स्नान करेगा उसे यमलोक नहीं जाना पड़े। इससे यमराज असमंजस में पड़ गए। उन्होंने कहा कि जो प्राणी भूलोक में आएगा उसे मरना पड़ेगा। कर्मों के अनुसार ही स्वर्ग और नरक मिलता है। तब यमुना ने वरदान मांगा कि जो भाई आज के दिन अपनी बहन के घर जाएगा। उसके घर भोजन करेगा और यमुना के जल से स्नान करेगा। उसे यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। तब से यह परंपरा चली आ रही है।