पर्वतीय क्षेत्र की खेती को बढ़ावा देने को सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं, लेकिन किसानों को लाभ नहीं मिल पा रहा है। सोमेश्वर क्षेत्र में पिछले कई सालों से 22 नहरें कई सालों से ठप हैं।
वहीं शीतकाल में बारिश नहीं होने से स्रोतों का जल स्तर घट जाने से एक दर्जन नहरों में पानी नहीं चल पा रहा है। खेतों तक पानी नहीं पहुंच पाने से इन क्षेत्रों में हजारों नाली भूमि में बोई गई रबी की फसलें बरबादी के कगार पर पहुंच चुकी हैं।
सिंचाई विभाग नहरों को दुरुस्त करने के दावे करता रहता है, लेकिन हालत यह है कि 2010 और 2013 की आपदा के दौरान क्षेत्र की तालखेत, नाखेत, अझौड़ा, जाल, कभाड़ी-पच्चीसी, बरसीला, सूपाकोट, रनमन, बाबरी, पायां, तल्ला मेहखेत, मिरई, भिलौली, सीर, गौरखेत, बिजौरिया, कांटली, बूंगा, भेटा, खुटकुड़िया, अकाली आदि नहरें ठप पड़ी हैं।
इन्हें कई सालों बाद भी दुरुस्त नहीं किया गया है। जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस पूरे इलाके में अनाज का उत्पादन भी कम हो गया है। नहरों में पानी नहीं चलने से किसान इस सिंचित भूमि में धान, गेहूं, आलू आदि के बजाए मोटे अनाज वाली मड़ुुवा, मादिरा आदि फसलें बोने को विवश हैं।
हालांकि कुछ किसानों ने जेनरेटर, पंपसेट किराए में लेकर सिंचाई की व्यवस्था की है। इस साल जाड़े के सीजन में बारिश नहीं होने से भी किसानों पर मार पड़ी है। बारिश नहीं होने से नदी आदि श्रोतों का जल स्तर काफी घट गया है।
पानी की कमी होने से पल्यूड़ा, मालाखेत, खिरखेत, हट्यूड़ा समेत 12 नहरों में पिछले एक महीने से पानी ही नहीं चल रहा है। जिससे संबंधित क्षेत्रों में सिंचाई व्यवस्था ठप पड़ी है। पानी के अभाव में रबी की फसलें सूख कर बरबादी के कगार पर पहुंच गई हैं।