रानीखेत (अल्मोड़ा)। ऋषिमुनियों की तपोस्थली होने के कारण पर्वतीय इलाकों में नदियों के तट पर तमाम देवी, देवताओं के मंदिर समूह हैं, गगास, मल्यालनदी के तट पर भगवान शिव फुलकेश्वर, दक्षेश्वर, पिंडेश्वर, विमांडेश्वर, मणकेश्वर सहित अनेक नामों से विराजमान हैं। दोनों नदियों के संगम तट पर प्राचीन गार्गेश्वर महादेव मंदिर भी इन्हीं में से एक है। नदियों का संगम और आसपास सुंदर वादियां होने के कारण यहां धार्मिक पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएं हैं लेकिन कार्रवाई नहीं हो सकी है।
गार्गेश्वर मंदिर रानीखेत से 21 किमी दूर दुगौड़ा गांव में स्थित है। मौनी महाराज के शिष्य पं. चंद्रशेखर शास्त्री बताते हैं कि स्कंदपुराण के मानसखंड में गार्गेश्वर मंदिर का जिक्र है। क्षेत्र में जब एक बार भीषण सूखा पड़ गया था, तब गर्ग ऋषि ने द्रोणांचल पहाड़ की तलहटी पर भगवान शिव को घोर तपस्या से प्रसन्न किया और भगवान शिव से मस्तक की गंगा से सूखा दूर कर स्वयं यहीं विराजमान होने की गुजारिश की।
दुगौड़ा, भेट, च्याली सहित तमाम ग्रामीण इस मंदिर में पूजा, अर्चना को आते हैं। मंदिर के शक्ति स्थल में शिवलिंग, शिव परिवार की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर में धर्मशाला निर्माण, नदी का कटाव रोकने के लिए चहारदीवारी बनाई गई है। कुमाऊंनी साहित्यकार विशन दत्त शैलज ने बताया कि नदियों के तट पर कई मंदिर समूह हैं, ऋषि मुनियों के नाम से शिव मंदिरों के नाम रखे गए हैं। स्थानीय ग्रामीण के नाते ब्रांज फैक्ट्री के महाप्रबंधक एलएम पांडे ने कहा कि इसके लिए सभी लोग एकजुट होकर इसके लिए प्रयास करना चाहिए।