उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश बनाने की बातें कई सालों से हो रही हैं, लेकिन इसके लिए अभी तक कोई ठोस काम नहीं हो सका है। हालत यह है कि हम अभी तक अपनी विरासतों को बचाने के लिए भी योजना नहीं बना सके हैं। पिथौरागढ़ के दारमा घाटी में रहने वाली जसूली सौक्याणी ने अंग्रेज शासन काल में अपने निजी धन से कुमाऊं के कैलाश मानसरोवर और अन्य यात्रा मार्गों में 200 से अधिक धर्मशालाएं बनवाईं।
इनमें से दर्जनों धर्मशालाएं आज भी मौजूद हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में उनकी यह विरासत बरबाद होती जा रही है। इन धर्मशालाओं का जीर्णोद्धार करके पुराने रास्तों को हेरिटेज रूट के तौर पर विकसित किया जा सकता है, लेकिन पर्यटन और संस्कृति विभाग का ध्यान आज तक इस ओर नहीं गया है।
व्यवसायिक कौशल और बुद्धि बल पर सौका भोटिया समाज अतीत से ही समृद्ध रहा है। पिथौरागढ़ जिले की सीमांत मुनस्यारी तहसील के अंतर्गत दारमा घाटी के दातों बूढ़ाराठ गांव की जसूली सौक्याणी कोई राज परिवार से नहीं थी, लेकिन धनवान थी। जसूली के एक मात्र बेटे का अल्पायु में ही निधन हो गया था।
सोना चांदी समेत वह अच्छी खासी संपत्ति की मालिक थी। कहा जाता है कि इस संपत्ति के उपयोग का तरीका नहीं सूझने पर जसूली सारा सोना चांदी एक पोटली में बांधकर धौलीगंगा नदी में फेंकने जा रही थी। इस बात की भनक लगने पर एक अंग्रेज अफसर उन्हें तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर रैमजे के पास ले गया।
कमिश्नर रैमजे की मदद से जसूली सौक्याणी ने कुमाऊं के विभिन्न इलाकों में यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनवाईं। यही नहीं उन्होंने बाद में नेपाल के महेंद्र नगर और बैतड़ी जिलों में भी धर्मशालाएं बनवाईं।
उन्होंने कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग में प्रत्येक नौ मील पर धर्मशालाओं का निर्माण करवाया ताकि श्रद्धालुओं को रात में रुकने के लिए ठौर मिल सके। इसके अलावा हल्द्वानी-अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ पैदल मार्ग में भी उन्होंने जगह-जगह धर्मशालाएं बनवाईं।
मुसाफिरों को पानी आदि की दिक्कत नहीं हो इसलिए यह धर्मशालाएं जल स्रोतों और नदियों के आसपास बनाई गई हैं। पत्थरों की छत वाली इन धर्मशालाओं में दरवाजे नहीं हैं। इन धर्मशालाओं में एक से लेकर 12 कमरे हैं। अनेक धर्मशालाएं देखरेख के अभाव में नष्ट हो गई हैं जबकि इनमें से कई धर्मशालाएं अभी तक बची हुई हैं।
इनमें अल्मोड़ा के निकट खीनापानी, कफड़खान, एनटीडी आदि स्थानों पर यह धर्मशालाएं अभी मौजूद हैं। एक अनुमान के मुताबिक कुमाऊं के विभिन्न इलाकों में ऐसी 50 से अधिक धर्मशालाएं अभी भी नष्ट होने से बची हुई हैं। इन धर्मशालाओं का जीर्णोद्धार करके पुराने रास्तों को हेरिटेज रूट के तौर पर विकसित किया जा सकता है। इससे स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिल सकेगा, लेकिन पर्यटन और संस्कृति विभाग का ध्यान आज तक इस ओर नहीं गया है।
सेवानिवृत मुख्य सचिव एनएस नपलच्याल कहते हैं कि इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करके इसे हेरिटेज पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। रं कल्याण संस्था ने पिथौरागढ़ जिले सतगढ़ और अल्मोड़ा जिले के सुयालबाड़ी के निकट स्थित दो धर्मशालाओं का जीर्णोद्धार भी करवाया है। इन सभी धर्मशालाओं का जीर्णोद्धार करके पर्यटन से जोड़ने के लिए प्रदेश सरकार को पत्र भी लिखा जाएगा।