जेडी सेंटर ऑफ आर्ट के निदेशक और कलाकार पद्मभूषण जतिन दास ने कहा कि कलाकार को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। समय परिर्वतन के साथ ही कला के स्वरूपों में भी बदलाव आना स्वाभाविक है, लेकिन कला के मूल स्वरूप में छेड़छाड़ से उसकी आत्मा खत्म हो जाती है।
श्री दास एसएसजे परिसर अल्मोड़ा के चित्रकला और दृश्य कला विभाग द्वारा जनजातीय कला विषय पर आयोजित सेमीनार में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कलाकार के लिए चित्रों में वास्तविकता को उकेरना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आदिवासी और जनजातीय कला प्रकृति के करीब होने से मानवीय संवेदनाओं को अधिक प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि कला संस्कृति का प्रतिविंब है।
इसे चित्रों में ही नहीं जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है। उन्होंने छात्र-छात्राओं से आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ें नहीं भूलने का आह्वान किया। सेमीनार के संयोजक प्रो. शेखर जोशी ने अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार जताया।
कार्यक्रम के दूसरे दिन विभिन्न सत्रों में प्रो. एमएस मावड़ी, प्रो. राम विरंजन, प्रो. सुनील कुमार ने अध्यक्षता की। जनजातीय कलाओं में परिवर्तन, भोटिया जनजाति की सामाजिक और सांस्कृति स्थिति में परिवर्तन, थारू जनजाति का कलात्मक और सांस्कृतिक महत्व आदि विषयों पर डा. राजेश शर्मा, रिमजी चोपड़ा, बिंदुलिका चोपड़ा, राजेंद्र कौर, डा. नमिता त्यागी, डा. कविता सिंह, मोनिका बनौला, डा. महेश प्रजापति आदि ने शोधपत्र पढ़े।
इस मौके पर चित्रकला विभागाध्यक्ष डा. सोनू द्विवेदी, डा. बीडीएस नेगी, डा. संजय टम्टा, डा. एसएस पांगती आदि मौजूद थे। संचालन डा. संजीव आर्या ने किया।