दृश्य और चित्रकला विभाग के तत्वावधान में एसएसजे परिसर में जनजातीय कला विषय पर तीन दिवसीय सेमिनार शुरू हो गया है।
उद्घाटन अवसर पर सांसद अजय टम्टा ने कहा कि लोक कलाएं हमारी संस्कृति और सभ्यता की धरोहरें हैं। जनजातीय कलाओं में भी पश्चिमीकरण का बढ़ रहा प्रभाव चिंताजनक है। जन जातीय कलाओं के संवर्द्धन और संरक्षण को प्रभावी प्रयास करने की जरूरत है।
सांसद ने कहा कि लोक कलाएं और संस्कृति समाज की पहचान और प्रतिबिंब होते हैं। समय बदलने के साथ ही लोक विधाओं का स्वरूप भी बदलने लगा है।
उन्होंने कहा कि आधुनिकीकरण के चलते दूरस्थ क्षेत्रों में बसने वाली जन जातीय समाजों की लोकलाएं भी प्रभावित हो रही हैं, जो चिंताजनक हैं।
उन्होंने कहा कि इन समृद्ध, प्रकृति के करीब लोक कलाओं के संरक्षण और संवर्द्धन को राज्य और केंद्र सरकार स्तर पर प्रभावी प्रयास करेंगे।
विशिष्ट अतिथि महादेवी सृनपीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि कला और साहित्य का गहरा संबंध है। उन्होंने जनजातीय कलाओं के वैज्ञानिक आधार पर संवर्द्धन पर जोर दिया।
संगोष्ठी के संयोजक प्रो. शेखर चंद जोशी ने जनजातीय कला के आर्थिक सामाजिक, ऐेतिहासिक, सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से अध्ययन करने की जरूरत है।
पद्मश्री डा. ललित पांडे ने कहा कि लोक कला केे मूल स्वरूप में बनाए रखने और इसके निरंतर प्रगति को इसे संग्रहालय से निकाल कर समाज में जिंदा रखना प्रासंगिक है।
अध्यक्षता करते हुए परिसर निदेशक प्रो. आरएस पथनी ने कहा कि लोक कलाएं लोक जीवन में बसती हैं। अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. दया पंत ने सभी का आभार जताया।
प्रो. एमएस मावड़ी, डा. एमएस पांगती, डा. सोनू द्विवेदी, प्रो. इला साह, कुलानुशासक प्रो. जगत सिंह, प्रो. जेएस रावत, प्रो. सीएम अग्रवाल, डा. कुसुमलता, डा. रेनू प्रकाश आदि मौजूद थे। संचालन डा. संजीव आर्या ने किया।