अल्मोड़ा। लोगों को जल्द ही बिना रेशे वाली फ्रेंचबीन खाने को मिलेगी। यही नहीं आम तौर पर छिलका उतार के खाने वाली मटर को भी भविष्य में लोग पूरे छिलके समेत खा सकेंगे। विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक इन दिनों मटर और फ्रेंचबीन के इसी शोध को पूरा करने में लगे हुए हैं। इससे पूर्व संस्थान कम रेशे वाली फ्रेंचबीन की किस्म विकसित कर चुका है।
आम तौर पर खेतों में उगने वाली हरी सब्जी मटर के छिलके निकालकर दानों की सब्जी बनाई जाती है। जिसमें 50 से 55 प्रतिशत तक वजन मटर के छिलके में ही निकल जाता रहा है, लेकिन वीपीकेएस के वैज्ञानिक पिछले दो साल से मटर की ऐसी प्रजाति विकसित करने के काम में लगे हुए हैं, जिसमें मटर को छिलके समेत खाया जा सके।
मटर की अग्रिम किस्म भी टेस्टिंग में है, जिसकी उपज 100 से 125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होने की उम्मीद की जा रही है। यही प्रयास फ्रेंचबीन में भी किया जा रहा है। इसकी भी दो अग्रिम किस्म टेस्टिंग में हैं, जिसमें 110 से 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज होने की उम्मीद की जा रही है। वीपीकेएस संस्थान से मिली जानकारी के अनुसार अगले दो साल में बिना रेशे वाली फ्रेंचबीन और छिलके वाली नई मटर का शोध पूरा हो जाएगा।
अल्मोड़ा। वीपीकेएस संस्थान अब तक गेहूं, चावल, मक्का, मडुवा, मादिरा, चुआ, उगल, मटर, बीन, मसूर, राजमा, गहत, सोया और ज्वार आदि की 70 वैरायटी निकाल चुका है। जिसमें गेहूं की छह, चावल की सात, मक्के की 10, ज्वार की चार, सोया की पांच, मडुवा, मादिरा, उगल और चुवा की 10 और विभिन्न किस्म की दालों की 16 और मटर की 12 किस्म की प्रजाति शामिल हैं।