उपमंडल क्षेत्र के हजारों लोगों की प्यास बुझाने वाले अधिकतर पारंपरिक नौले और धारे उचित संरक्षण के अभाव में सूखने की कगार पर हैं। संवर्धन को बनी योजनाएं भी अपेक्षित रूप से धरातल पर नहीं दिखाई देती। कई स्थानों पर ईंट और कंकरीट के जंगल विकसित हो चुके हैं, जिससे अधिकतर नौले पट चुके हैं।
बचे हुए नौले और धारे संरक्षण न मिलने से सूखने की कगार पर हैं। ग्रीष्मकाल में रानीखेत उपमंडल के कई इलाकों में पेयजल का विकट संकट खड़ा हो जाता है।
चंद और कत्यूरी वंशीय राजाओं ने उपमंडल क्षेत्र की 675 पंचायतों में 1500 से अधिक नक्काशी के नौले स्थापित किए थे। हालांकि अब वन विभाग ने प्राचीन पेयजल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए चाल खाल और जलाशयों का निर्माण करना शुरू कर दिया है।
ब्रिटिशकालीन आबकारी धारे में पानी की मात्रा कम होने लगी है। धारे के आसपास लगे पुराने आठ बांज के पेड़ उखड़ चुके हैं। कुछ पेड़ों से खतरा बना हुआ है। स्थानीय निवासी मोहन नेगी, कुंदन गिरि गोस्वामी कुंदा, बीएल साह आदि ने बताया कि संवर्धन के लिए वन विभाग छावनी परिषद के सहयोग से कई बांज के पौधों का रोपण किया गया है।
गर्मियों में ताड़ीखेत-गगास पेयजल योजना से जुड़े गांवों में पानी का घोर संकट खड़ा हो जाता है। चिलियानौला क्षेत्र में सबसे अधिक समस्या रहती है। लोग नौपय्या, भुमियां और लछिमा धारों पर रात्रि में भी डटे रहते हैं। नगर में संकट के समय लोग आबकारी, पुदीनापानी, धोबीधारा आदि धारों पर निर्भर रहते हैं। हालांकि छावनी परिषद टैंकरों से पानी बांटती है।