रानीखेत (अल्मोड़ा)। ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को संसाधन मुहैया कराकर उन्हें आगे बढ़ाने के दावों में कितना दम है, छानागोलू में स्वीकृत मिनी खेल स्टेडियम इसकी तस्दीक कर रहा है। यहां 32 साल बाद भी स्टेडियम अस्तित्व में नहीं आ सका है, खेल मैदान के अभाव में ही युवा समारोह में इस बार ग्रामीण प्रतिभाएं खेल गतिविधियों से महरूम रह गई। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की उपेक्षापूर्ण रवैये के चलते खेल प्रेमी खफा हैं।
छानागोलू में मिनी स्टेडियम बनाने की मांग वर्षों पुरानी है। ग्रामीणों की मांग पर तीन दशक पूर्व यहां मिनी स्टेडियम को स्वीकृति मिली, लेकिन निर्माण शुरू नहीं हुआ। कई बार खेल प्रेमी आंदोलन तक कर चुके हैं। 24 फरवरी 2006 को भैंट गांव के ग्रामीणों ने युवा कल्याण विभाग को मैदान के लिए 21 नाली नाप भूमि दान की। 2009 में शासन ने मैदान के लिए 46 लाख रुपए स्वीकृत किए और 10 लाख रुपए की टोकन मनी भी जारी कर दी।
आरईएस विभाग द्वारा निविदाएं भी आमंत्रित की गई। सामाजिक कार्यकर्ता, रंगकर्मी, खेल प्रेमी हरीश डौर्बी ने बताया कि इसके 10 दिन बाद ही शासन ने उक्त निविदाएं निरस्त कर यह कार्य लोक निर्माण निगम को सौंप दिया। निगम ने डेढ़ साल बाद स्टेडियम का नया आंकलन बना कर डेढ़ करोड़ का प्रस्ताव शासन को भेजा, लेकिन इस प्रस्ताव को शासन ने स्वीकार नहीं किया।
2011 में शासन ने स्टेडियम निर्माण को मनरेगा के तहत करने के आदेश जारी किए। 30 सालों तक लगातार युवा समारोह खेतों में चलता रहा, लेकिन इस बार युवा समारोह के तहत खेल गतिविधियों के लिए व्यवस्था नहीं बन सकी। परिणामस्वरूप ग्रामीण प्रतिभाएं खेल गतिविधियों से वंचित रह गई। इस समारोह के तहत क्रिकेट, वॉलीबॉल आदि सांस्कृतिक गतिविधियां भी आयोजित होती हैं।
रानीखेत। सामाजिक कार्यकर्ता, रंगकर्मी, खेलप्रेमी हरीश डौर्बी ने बताया कि मिनी खेल स्टेडियम की फाइल युवा कल्याण विभाग देहरादून में है, लेकिन बजट जारी नहीं हुआ है। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस मांग पर ध्यान नहीं दिया। अब आंदोलन ही एकमात्र सहारा है।
फोटो: 25 आरकेटी 01पी: रानीखते के भेट गांव में इसी स्थान पर होना था मिनी खेल स्टेडियम का निर्माण।