प्रागैतिहासिक काल में गुफाओं में रहने वाले मानव द्वारा पेटशाल में स्थित लखुडियार की गुफा में बनाए गए शैल चित्र रखरखाव के अभाव में खराब होने लगे हैं। पिछले कुछ सालों से गुफा के ऊपर की चट्टान से बारिश का पानी रिसकर इन शैल चित्रों में आ रहा है। जिससे शैलचित्रों के ऊपर काई जमने लगी है। यही नहीं गुफा वाली इस चट्टान को संरक्षित रखने के लिए ऊंची सुरक्षा दीवार भी नहीं बनी है।
इस कारण कई बार काफी संख्या में लोग चट्टान के ऊपर जमा हो जाते हैं इससे भी गुफा को खतरा बना हुआ है। अब पुरातत्व विभाग ने इस ऐतिहासिक गुफा और इसमें बने महत्वपूर्ण शैल चित्रों को संरक्षित करने की एक योजना तैयार की है। इसे मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय को भेजा जा रहा है।
अल्मोड़ा-बाड़ेछीना मार्ग पर अल्मोड़ा से करीब 16 किमी दूर पेटशाल में प्रागैतिहासिक काल में गुफाओं में रहने वाले मानव द्वारा बनाए गए शैलचित्र पुरातत्व की दृष्टि से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें मानव आकृतियां, तरंगित रेखाएं, जानवरों की आकृतियां बनी हैं। इन शैल चित्रों की 1970 में खोज हुई और 1992 में राज्य पुरातत्व विभाग ने इसे अपने संरक्षण में ले लिया था।
हाल के कुछ सालों से गुफा के ऊपर की चट्टान से बारिश का पानी रिसकर शैल चित्रों तक पहुंच रहा है जिससे शैलचित्र खराब होने लगे हैं। कई शैल चित्रों पर काई जमने लगी है। पुरातत्व विभाग ने वहां पर गेट आदि का निर्माण किया है, लेकिन गुफा के ऊपर की चट्टान की बनावट इस तरह है कि लोग गेट बंद हो जाने के बाद भी शैल चित्रों तक आसानी से पहुंच जाते हैं।
कई बार वहां आने वाले लोग भी शैल चित्रों के साथ छेड़खानी करके नुकसान पहुंचाते हैं। कभी काफी संख्या में लोग गुफा के ऊपर की तरफ चट्टान में चढ़ जाते हैं। जिससे दुर्घटना का भी खतरा बना रहता है। इधर क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा. सीएस चौहान ने बताया है कि लखुडियार की गुफा और ऊपर की चट्टान को कवर करते हुए चहारदीवारी का निर्माण करने और चट्टान के ऊपर फाइवर की छत डालने का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
इससे जहां लोग चट्टान के ऊपर नहीं बैठ सकेंगे वहीं चट्टान से गुफा के भीतर पानी का रिसाव भी नहीं हो पाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि पुरातत्व विशेषज्ञों की राय लेकर शैल चित्रों के सामने पारदर्शी शीशे लगाए जाएंगे ताकि लोग शैलचित्रों को देख सकें लेकिन उन्हें छूकर नुकसान नहीं पहुंचाएं। इसके अलावा गुफा के निकट बैंचों के निर्माण का भी प्रस्ताव तैयार किया गया है।
यह प्रस्ताव शीघ्र ही राज्य संस्कृति विभाग के माध्यम से केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को भेजा जा रहा है। मंजूरी मिलने के बाद लखुडियार की गुफा में कार्य शुरू किया जाएगा। डा. चौहान ने बताया कि गुफा के ऊपर चट्टान में स्थित दो सूखे चीड़ के पेड़ों की जड़ों से भी बारिश का पानी रिसकर शैल चित्रों तक पहुंच रहा था। इसे देखते हुए वन विभाग से अनुमति लेकर इन दोनों पेड़ों को भी कटवा दिया गया है।
शैल चित्रों को जरूरी ट्रीटमेंट देकर साफ किया जाएगा
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा.सीएस चौहान ने बताया कि लखुडियार की गुफा में बने शैलचित्रों में पानी के रिसाव और अन्य कारणों से लगी काई और अन्य दाग आदि को जरूरी ट्रीटमेंट देकर साफ किया जाएगा। इसके लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देहरादून में स्थित विज्ञान शाखा को पत्र भेजा गया है।