अल्मोड़ा। बदलती जीवनशैली, पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और स्वास्थ्य के प्रति आम लापरवाही के बीच जिले में सोरायटिक आर्थराइटिस के मामले सामने आ रहे हैं। शनिवार को विश्व सोरायटिक आर्थराइटिस दिवस के मौके पर अल्मोड़ा के परिप्रेक्ष्य में इस गंभीर बीमारी को लेकर चिकित्सा विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। डॉक्टरों का साफ कहना है कि उचित जानकारी के अभाव में लोग त्वचा के धब्बों या जोड़ों के दर्द को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर रहे हैं जो आगे चलकर स्थायी शारीरिक विकलांगता का कारण बन सकता है।
चिकित्सकों के अनुसार यह एक जटिल ऑटोइम्यून बीमारी है जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता खुद ही स्वस्थ कोशिकाओं, जोड़ों और त्वचा पर हमला करने लगती है। अल्मोड़ा और रानीखेत के अस्पतालों की ओपीडी में आने वाले जोड़ों के दर्द और गठिया से पीड़ित कई मरीजों में सोरायसिस (त्वचा पर लाल, पपड़ीदार धब्बे) के लक्षण भी पाए जा रहे हैं। पहाड़ों में ठंड और अत्यधिक शारीरिक श्रम के कारण लोग अक्सर शुरुआती जोड़ों के दर्द को ठंड का असर या थकान मानकर पेनकिलर (दर्द निवारक दवाएं) खाकर टालते रहते हैं जो बेहद खतरनाक साबित हो रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस ऑटोइम्यून बीमारी को लेकर जागरूकता का अभाव है। लोग घरेलू नुस्खों या स्थानीय स्तर पर बिना डॉक्टरी सलाह के स्टेरॉयड जैसी दवाएं ले लेते हैं जिससे बीमारी कुछ समय के लिए दब जाती है लेकिन बाद में और गंभीर रूप धारण कर लेती है। इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्रों में सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टरों (रुमेटोलॉजिस्ट) की कमी के कारण मरीजों को उचित इलाज के लिए हल्द्वानी या हायर सेंटर के चक्कर काटने पड़ते हैं।
बचाव और सही समय पर इलाज ही समाधान
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यदि आपकी त्वचा पर लाल चकत्ते, सिर की त्वचा में पपड़ी (डैंड्रफ जैसी) और साथ में सुबह के समय जोड़ों में तेज जकड़न या सूजन की शिकायत हो तो इसे हल्के में न लें। शुरुआती स्टेज में सही दवाओं और नियंत्रित जीवनशैली की मदद से इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है और विकलांगता से बचा जा सकता है।
डॉक्टरों की चेतावनी : नजरअंदाजी पड़ सकती है भारी
• त्वचा और जोड़ों का अंतर्संबंध : लगभग 30 फीसदी सोरायसिस (त्वचा रोग) के मरीजों को आगे चलकर सोरायटिक आर्थराइटिस होने का खतरा रहता है।
• पहचान में देरी: लोग पहले त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास जाते हैं और जोड़ों के दर्द को अलग समस्या मानते हैं। जब तक वे सही रुमेटोलॉजिस्ट या विशेषज्ञ तक पहुंचते हैं, तब तक जोड़ों के कार्टिलेज और हड्डियां बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी होती हैं।
फिजिशियन डॉ. महेश पाल ने बताया कि पहाड़ में ठंड की शुरुआत और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण लोग जोड़ों के दर्द को बहुत सामान्य मान लेते हैं। सोरायटिक आर्थराइटिस एक ऐसी ऑटोइम्यून बीमारी है जो न केवल त्वचा पर असर डालती है बल्कि सीधे हमारे जोड़ों पर हमला करती है। यदि सुबह उठते ही जोड़ों में एक घंटे से ज्यादा जकड़न रहे, उंगलियों में सूजन हो और त्वचा पर पपड़ीदार धब्बे हों तो तुरंत अस्पताल आकर जांच कराएं। शुरुआती स्टेज में सही इलाज शुरू होने से जोड़ों को हमेशा के लिए खराब होने और शारीरिक विकलांगता से पूरी तरह बचाया जा सकता है।