पांडवखोली में ध्यान करती विदेशी महिला।
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पौराणिक महत्व वाला पांडवखोली अब ध्यान और योग के शौकीनों के लिए महत्वपूर्ण स्थल बनने लगा है। समुद्रतल से 8800 फुट की ऊंचाई पर स्थित इस एकांत स्थल पर देसी ही नहीं विदेशी भी आकर योग और ध्यान करते हैं। बताया जाता है कि महाभारत युद्ध से पहले पांडवों ने यहां अज्ञातवास काटा। पांडवों की तलाश में कौरव सेना भी यहां पहुंची जिस कारण इसे कौरवछीना भी कहा जाता है। हालांकि तमाम कोशिशों के बावजूद यह स्थल अभी तक आध्यात्म और धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं हो सका है।
रानीखेत से पांडवखोली की दूरी लगभग 50 किमी है। द्वाराहाट से आगे कुकूछीना से साढ़े तीन किमी की खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है। पांडवखोली से कुमाऊं और गढ़वाल के ऊंचे स्थल दिखाई देते हैं। हिमालय का विहंगम दृश्य बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। इस स्थल का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व रहा है। कहा जाता है कि जब पांडवों को अज्ञातवास हुआ था, तब पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ यहीं रहे थे। यहां स्थित बुग्यालनुमा स्थल को भीम की गुदड़ी नाम से जाता है।
बाद में ब्रह्मलीन महंत बलवंत गिरि महाराज की नजर इस स्थल पर पड़ी तो उन्होंने इसके विकास के लिए प्रयास किए और भव्य मंदिर का निर्माण कराया। अब यहां आश्रम भी बन चुका है। आश्रम के संयोजक समिति के अध्यक्ष हरीश शाह का कहना है कि पर्यटन विभाग से मंदिर परिसर में चहारदीवारी और रोपवे लगाने की मांग की गई है। वह कहते हैं कि शासन-प्रशासन मदद करे तो यह क्षेत्र पर्यटन के मानचित्र में अग्रिम स्थान बना सकता है।