सोमेश्वर (अल्मोड़ा)। रुक-रुक कर हो रही बारिश के बीच सोमेश्वर घाटी में धान की रोपाई का कार्य शुरू हो गया है। क्षेत्र के गांवों में इन दिनों खेतों में किसानों की चहल-पहल बढ़ गई है। सुबह से ही किसान परिवार धान की पौध रोपने में जुटे हुए हैं। विशेष रूप से महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से खेतों में पारंपरिक लोक संस्कृति की सुंदर झलक देखने को मिल रही है।
कुमाऊं के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में शामिल सोमेश्वर घाटी को लंबे समय से धान का कटोरा कहा जाता है। यहां की उपजाऊ भूमि और अनुकूल जलवायु धान उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रही है। समय पर हुई बारिश से किसानों के चेहरे खिल उठे हैं और उन्होंने खेतों की तैयारी पूरी कर रोपाई कार्य तेज कर दिया है। क्षेत्र के कई गांवों में आज भी पारंपरिक तरीके से सामूहिक रूप से धान की रोपाई की जा रही है।
खेतों में महिलाओं और पुरुषों के साथ मिलकर काम करने का दृश्य ग्रामीण एकता और सहयोग की मिसाल पेश कर रहा है। रोपाई के दौरान गाए जा रहे लोकगीत और पारंपरिक धुनें ग्रामीण संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं। किसानों का कहना है कि इस वर्ष समय पर वर्षा होने से खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हैं। यदि मौसम इसी प्रकार साथ देता रहा तो धान की अच्छी पैदावार की उम्मीद है। उनका मानना है कि धान की फसल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है और बड़ी संख्या में परिवार इसकी खेती पर निर्भर हैं। रोपाई के मौसम में गांवों में आपसी सहयोग की परंपरा भी देखने को मिल रही है।
ग्रामीण एक-दूसरे के खेतों में श्रमदान कर खेती के कार्यों को समय पर पूरा करने में मदद कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद सोमेश्वर क्षेत्र में पारंपरिक खेती, लोकगीत और सामूहिक श्रम की संस्कृति आज भी जीवित है। खेतों में गूंजते लोकगीतों और हरियाली से भरते खेतों के बीच ग्रामीण जीवन की सुंदर और जीवंत तस्वीर देखने को मिल रही है।