अल्मोड़ा जिला अस्पताल का निरीक्षण करती दिल्ली से पहुंची इंजीनियरों की टीम।
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अल्मोड़ा। अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिमालयी राज्यों में होने वाली प्राकृतिक उथल-पुथल हमेशा से चर्चा का विषय रही है। 2011 और 2013 में प्रदेश में आई आपदा में इसका सटीक उदाहरण है। आपदा के दौरान और बाद में विषय विशेषज्ञों ने अनियोजित विकास को इसका कारण बताया था और सरकारों को कई सुझाव भी दिए थे। लेकिन स्थिति यह है कि आज भी सरकारों की ओर से कोई विशेष नियम या नीतियां नहीं बनाई गई हैं।
पहाड़ी जिलों में आवासीय भवन ही नहीं सरकारी भवन भी भूकंप की दृष्टि से मानकों में खरे नहीं हैं। अल्मोड़ा का जिला और महिला अस्पताल भी बड़े भूकंप को झेल पाने की क्षमता में खरा नहीं उतर रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों में बनने वाले 80 प्रतिशत मकानों में मानकों का ध्यान नहीं रखा जाता है। ड्रेनेज सिस्टम की समस्या पहाड़ों में लगातार घटती जा रही है। प्राइवेट के अलावा सरकारी आवासों में तक ड्रेनेज की सुविधा नहीं है। यहां मकान भी आपस में इतने चिपके हुए हैं कि भूकंप जैसी स्थिति आने पर लोगों को बचाना जोखिम भरा काम है। विशेषज्ञोें का मानना है कि पहाड़ में समतल और बेस में ठोस पत्थर वाली जमीन सुरक्षित रहती है और जमीन का झुकाव 30 डिग्री कम होना चाहिए और जमीन के दाएं, बाएं या नीचे पानी नहीं होना चाहिए।
शनिवार को नेशनल डिस्जास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी दिल्ली से पहुंचे चार सदस्यीय इंजीनियरों की टीम ने जिला और महिला अस्पताल का सर्वे किया। असिस्टेंट इंजीनियर सुमित सिंह ने बताया कि भूकंप की दृष्टि से अल्मोड़ा जोन पांच में आता है। जिला अस्पताल का ब्लड बैंक भूकंप की दृष्टि से काफी संवेदनशील है।
अस्पताल में अन्य जगह भी कई कमजोर प्वाइंट मिले हैं। इसके अलावा महिला अस्पताल का भवन काफी पुुराना और कमजोर है। असिस्टेंट इंजीनियर ने बताया कि डाटा एकत्र कर एनालिसिस किया जाएगा। जो भवन झटका नहीं झेल सकते उनका रेट्रोसीटिंग (कालम मजबूत) करने का काम किया जाएगा।