सुगम-दुर्गम योजना को शिक्षा विभाग में यदि नेतागिरि का अखाड़ा कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। शासन ने जब से विद्यालयों को सुगम, दुर्गम और अतिदुर्गम श्रेणियों में बांटा है, तब से लगातार यह योजना विवादों में घिरी रहती है। ताजा मामला ताड़ीखेत ब्लाक के राजकीय प्राथमिक विद्यालय बिष्टकोटली का है। यह विद्यालय ब्लॉक मुख्यालय से 35 किमी की दूरी पर है। आरोप है कि अपनों को लाभ पहुंचाने के लिए विभागीय अधिकारियों ने इस दुर्गम विद्यालय को सुगम बना दिया, जबकि आसपास के विद्यालयों को दुर्गम विद्यालय की श्रेणी में दर्शाया गया है।
प्राथमिक शिक्षक संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि राजकीय प्राथमिक विद्यालय बिष्टकोटली पूर्व में दुर्गम श्रेणी में था, लेकिन अधिकारियों की मनमर्जी से इस विद्यालय को सुगम विद्यालय दर्शा दिया गया है। जबकि ब्लॉक मुख्यालय से विद्यालय की दूरी 35 किमी, सड़क से पैदल दूरी साढ़े तीन किमी है। अध्यापकों को वेतन भी रानीखेत स्थित बैंकों से ही मिलता है।
विद्यालय के आस पास स्वास्थ्य सुविधा, रोजमर्रा की वस्तुएं तक नहीं मिल पाती हैं। जबकि इस विद्यालय के पास में स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय दुगौड़ा और गढ़ोली को दुर्गम विद्यालय की श्रेणी में दर्शाया गया है। अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए कोटिकरण गलत कर दिया है। सुगम-दुर्गम के मानकों को पूरी तरह से दरकिनार किया जा रहा है। ब्लॉक अध्यक्ष किशोर जोशी, सरोज पपने, राम सिंह जनी, कमलेश बिष्ट, प्रधान जीवन बिष्ट आदि ने कहा कि सही मानकों के आधार पर ही सुगम-दुर्गम का निर्धारण किया जाना चाहिए।