अल्मोड़ा। एसएसजे परिसर में बीएससी गणित और बायो ग्रुप के साथ ही बीसीए, बीकॉम, बीएफए प्रथम वर्ष में सीटें बढ़ा दी गई हैं। सबसे अधिक सीटें बीएससी में बढ़ी हैं। सीटें बढ़ने के बाद एनएसयूआई कार्यकर्ताओं ने आंदोलन भी समाप्त कर दिया है।
एसएसजे परिसर के निदेशक प्रो. नीरज तिवारी ने बताया कि संबंधित संकायाध्यक्षों और विभागाध्यक्षों के साथ बैठक करने के बाद छात्रहितों को देखते हुए बीएसएसी प्रथम वर्ष गणित ग्रुप में 62 और जीवविज्ञान ग्रुप में 60 सीटें बढ़ाने का फैसला लिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि निर्धारित सीटें भर जाने के बाद पिछले साल गणित ग्रुप में 62 और बायो ग्रुप में 60 छात्रों को स्ववित्त पोषित सीटों के तौर पर प्रवेश दिया गया था। इससे छात्रों को काफी अधिक शुल्क का भुगतान करना पड़ता था लेकिन इस बार छात्रों के व्यापक हितों को देखते हुए इन सीटों को सामान्य सीट के तौर पर बढ़ा दिया गया है और अब छात्रों को इनमें मेरिट के लिस्ट के हिसाब से सीधे प्रवेश मिल जाएगा। जिन छात्रों ने सीटें न मिलने के कारण अन्य विषयों में प्रवेश लिया है, उन्हें भी मेरिट के अनुरूप गणित अथवा बायो ग्रुप में प्रवेश लेने के लिए तीन दिन का समय दिया गया है। परिसर निदेशक प्रो. तिवारी ने यह भी बताया कि बीकॉम प्रथम वर्ष में 10 सीटें बढ़ाई गई हैं, जबकि बीसीए में 20 प्रतिशत (12 सीटें) और बीएफए में पांच प्रतिशत (दो सीटें) बढ़ा दी गई हैं। इधर परिसर में बीएससी सहित अन्य विषयों में सीटें बढ़ाने के बाद एनएसयूआई कार्यकर्ताओं का बेमियादी आंदोलन भी समाप्त हो गया है। एनएसयूआई कार्यकर्ताओं को परिसर निदेशक प्रो. तिवारी ने सीटें बढ़ाने की जानकारी दी। इसके बाद एनएसयूआई ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की। इस मौके पर एनएसयूआई जिला संयोजक राहुल खोलिया, संजू सिंह, विपुल कार्की, विशाल साह, अमित बिष्ट आदि थे।
अब बीएससी में स्ववित्त पोषित व्यवस्था पूरी तरह समाप्त
अल्मोड़ा। एसएसजे परिसर में पिछले कई साल से बीएससी प्रथम वर्ष में निर्धारित सीटें भर जाने के बाद प्रवेश से वंचित रहने वाले छात्रों को स्ववित्त पोषित तौर पर बीएससी प्रथम वर्ष में प्रवेश दे दिया जाता था। इसके लिए छात्रों से अतिरिक्त शुल्क लिया जाता था। बीएससी प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के बाद बीएससी द्वितीय वर्ष में उन्हें सामान्य सीटों में ही प्रवेश मिल जाता था। अब नए परिसर निदेशक प्रो. नीरज तिवारी ने बीएससी प्रथम वर्ष में स्ववित्त पोषित व्यवस्था को पूरी तरह बंद करवा दिया है।