हुक्का क्लब में होली गायन करते होली गायक। (फाइल फोटो)
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अल्मोड़ा। पूस माह के पहले रविवार 22 दिसंबर से कुमाऊं में बैठकी होली शुरू हो जाएगी। होली गायन के दौरान गुड़ के साथ मुंह मीठा कराया जाता है। बताया जाता है कि चंद राजाओं के शासनकाल में भी बैठकी होली की गूंज सुनाई देती थी। ऐसा भी माना जाता है कि होली गायन की यह धरोहर आज से करीब 300 वर्ष पूर्व कुमाऊं में अपना स्थान बना चुकी थी। पूस माह से बसंत पंचमी तक भक्ति और निर्वाण के पदों पर गायन किया जाता है।
कुमाऊं में होली गायन की विधा का लंबा इतिहास माना जाता है। चंद राजाओं के शासनकाल में धमार गीत की यह पंक्ति तुम राजा महाराज प्रद्युम्रशाह, मेरी करो प्रतिपाल, लाल होली खेल रहे हैं... इस बात के प्रमाण देती है कि होली गायन की यह विधा तब के राजाओं को भी काफी पसंद आती थी। यही नहीं उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बैठकी होली गायन की परंपरा का श्रीगणेश अल्मोड़ा से ही माना जाता है।
कुमाऊं के प्रख्यात होली गायक शिवचरण पांडे बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में बैठकी होली का श्रीगणेश अल्मोड़ा के मल्ली बाजार स्थित हनुमान मंदिर से हुआ। उस दौर में स्व. गांगीराम वर्मा, स्व. शिवलाल वर्मा, स्व. मोहन लाल साह और चंद्र सिंह नयाल आदि सुप्रसिद्ध होली रसिकों ने होली बैठकों का आयोजन किया। ठुमरी, टप्पा और गजल गायकी में सिद्धहस्त रहीं गणिका राम प्यारी को आदर भाव से होली गायन के लिए बुलाया जाता था।
उसके बाद प्रख्यात होली गायक स्व. तारा प्रसाद पांडे ने बैठकी होली को नया आयाम दिया। 19वीं सदी में मुसलमान गायक भी अल्मोड़ा आते रहे थे। इनमें उस्ताद अमानत हुसैन बड़ा नाम था। जिन्होंने होली गायन को उप शास्त्रीय स्वरूप प्रदान किया। होली गायक शिव चरण पांडे ने बताया कि पूस माह के पहले रविवार से बसंत पंचमी तक विभिन्न रागों में भक्ति रस प्रधान होली गायन किया जाता है।