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कांग्रेस ने महापंचायत के माध्यम से रखा प्रदेश सरकार का पक्ष

Sun, 14 Feb 2016 01:40 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, रानीखेत/द्वाराहाट (अल्मोड़ा)।
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 पलायन के चलते पहाड़ों का अस्तित्व खत्म हो रहा है। अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराकर इस समस्या को दूर किया जा सकता है। चिंतित प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नानीसार में अंतरराष्ट्रीय आवासीय विद्यालय खोलने के लिए जिंदल समूह को सरकारी स्वामित्व की भूमि आवंटित की है, लेकिन कुछ मौकापरस्त लोग निजी हितों के लिए ग्रामीणों को बहलाकर इसका विरोध कर रहे हैं।
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उरोली में कांग्रेस की महापंचायत को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने विरोध कर रहे लोगों पर ही ताबड़तोड़ सवाल दाग दिए। कहा कि चितई ग्वेल मंदिर में शराब व्यापारी द्वारा घंटी चढ़ाने संबंधी आंदोलन हो या शराब आंदोलन। यह आंदोलन कभी भी मुकाम तक नहीं पहुंच सके।

 पूर्व प्रस्तावित कार्यक्रम के तहत नानीसार के निकट उरोली में सुबह से ही आसपास के सैकड़ों ग्रामीण पहुंच गए। पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा, विधायक मनोज तिवारी, रेखा आर्या, पूर्व विधायक करन माहरा, बिट्टू कर्नाटक, प्रशांत भैसोड़ा, राजेंद्र बाराकोटी, नारायण रावत, जिला महामंत्री भानु जोशी आदि ने ग्रामीणों को अंतरराष्ट्रीय आवासीय विद्यालय का महत्व समझाया। कहा कि स्कूल बनने से क्षेत्र का विकास होगा।
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 रोजगार मिलेगा, पढ़ाई में ग्रामीण बच्चों को आरक्षण भी मिलना है। कहा कि पलायन के चलते पहाड़ों का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है। प्रदेश सरकार पहाड़ों को आबाद करने की कोशिश कर रही है लेकिन कुछ मौकापरस्त लोग निजी हितों के लिए ग्रामीणों को बहला फुसलाकर स्कूल का विरोध कर रहे हैं, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।

वक्ताओं ने कहा कि कुछ साल पूर्व इन्हीं विरोधी ताकतों ने चितई ग्वेल मंदिर में एक शराब व्यवसायी को घंटी चढ़ाने नहीं दिया, आंदोलन किया, लेकिन बाद में सेटिंग कर ली और व्यवसायी वहां घंटी चढ़ाने में सफल रहा। कहा कि निजी स्वार्थों के लिए ग्रामीणों को आधार बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है। ग्रामीणों को ऐसे लोगों का बहिष्कार करना चाहिए।

 वक्ताओं ने कहा कि जो ताकतें नानीसार स्कूल का विरोध कर रही है ऐसी ताकतों ने कभी भी क्षेत्र के विकास में सहयोग नहीं दिया। स्थानीय लोगों के हितों की बात होने पर मौकापरस्त लोग इसमें हस्तक्षेप कर रहे हैं।

 सवाल पूछे कि क्या ऐसे लोगों ने कभी भी ग्रामीण परिवेश में स्कूल खुलवाने में कोई योगदान दिया। द्वारसौं-काकड़ीघाट मोटर मार्ग 42 सालों से जीर्ण क्षीर्ण पड़ा है, इसे ठीक कराने के लिए कभी ऐसी ताकतें सामने नहीं आई। पहाड़ से हो रहे पलायन को रोकने के लिए इन लोगों ने कभी कोई सुझाव नहीं दिया।
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