अल्मोड़ा। सैकड़ों साल पुराना अल्मोड़ा का ताम्र उद्योग अब दम तोड़ने लगा है। अल्मोड़ा के टम्टा मोहल्ले में करीब 72 परिवार इस व्यवसाय से जुड़े थे और हर परिवार का अपना कारखाना था, लेकिन हाल के वर्षों में मशीनीकरण के आगे यहां के ताम्र कारीगर नहीं टिक पा रहे हैं। जिससे करीब 200 ताम्र कारीगरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है और कई ताम्र शिल्पी रोजगार की तलाश में यहां से पलायन कर चुके हैं, जबकि कई कारीगरों ने इस काम को ही छोड़ दिया है।
अल्मोड़ा का ताम्र उद्योग करीब 400 साल पुराना है। यहां के ताम्र कारीगरों के हाथों से बने तांबे के बर्तन आज भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। एक जमाने में इस उद्योग में काम करने वाले ताम्र कारीगर अच्छी खासी आय अर्जित करते थे और उनकी कला की काफी तारीफ भी होती थी। इन कारीगरों द्वारा बनाए गए परंपरागत तौला, गागर, परात, पूजा के बर्तन के अलावा वाद्य यंत्र रणसिंघा, तुतरी आदि बहुत प्रसिद्ध थे।
कई लोग तो सिर्फ इन बर्तनों की खरीददारी के लिए अल्मोड़ा आते थे। पिछले करीब 10 साल से अब रामनगर, मुरादाबाद और हल्द्वानी में लगे मशीन प्लांटों में तांबे के बर्तन और अन्य शो पीस तैयार होने लगे हैं। मशीनों में बनने पर बर्तनों की लागत काफी कम आ रही है और उनमें चमक भी अच्छी होती है। इस कारण बड़े व्यवसायी मशीन से बने बर्तनों को प्राथमिकता देने लगे हैं। हालांकि आज भी तांबे के बड़े बर्तन और फिल्टर आदि मशीन में नहीं बन पा रहे हैं।
ताम्र व्यवसायी थोड़ा बहुत कच्चा माल लेकर बर्तन, शोपीस आदि तैयार करके स्थानीय व्यवसायियों को बिक्री के लिए उपलब्ध कराते हैं, लेकिन इससे वह बहुत अधिक नहीं कमा पाते। इस काम में लगे चंद्रशेखर टम्टा बताते हैं कि काफी मेहनत के बावजूद कमाई बहुत कम होती है। इस कारण अधिकांश ताम्र शिल्पियों ने यह काम छोड़ दिया है। एक अन्य ताम्र शिल्पी नवीन कुमार टम्टा ने बताया कि नई पीढ़ी के लोग इस काम को नहीं कर रहे हैं।
कई ताम्र शिल्पी रोजगार की तलाश में सिडकुल और अन्य इलाकों को पलायन कर गए हैं। जबकि कई ताम्र शिल्पी दूसरे काम करने लगे हैं। अब करीब दर्जन भर ताम्र शिल्पी इस काम को कर रहे हैं। ताम्रकारों का कहना है कि कहना है कि इस परंपरागत उद्योग को जीवित रखने और ताम्र शिल्प को बढ़ावा देने के लिए सरकार को योजना बनानी चाहिए। उनका कहना है कि मशीनीकरण के बाद यहां काम करने वाले कारीगरों को भी छोटी मशीनें उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
अल्मोड़ा। मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा जून 2015 में की गई घोषणा के अनुरूप अल्मोड़ा ताम्र नगरी से जुड़े शिल्पियों को प्रशिक्षण देने के लिए 4.80 लाख रुपये की एक योजना निदेशालय को भेजी गई है। जिला उद्योग केंद्र की महाप्रबंधक कविता भगत ने बताया कि इस योजना के अंतर्गत 30 ताम्रकारों को दो माह का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
प्रशिक्षण में उन्हें नए डिजाइनों के बारे में जानकारी दी जाएगी। ताकि उनके द्वारा बनाए जाने वाली चीजों को तुरंत बाजार मिल सके। इस योजना के लिए शासन से धन मिल जाने के बाद प्रशिक्षण शुरू कर दिया जाएगा। महाप्रबंधक प्रशिक्षण के बाद उन्हें विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत लोन भी मिल सकता है।