रानीखेत (अल्मोड़ा)। सीसीआरएएस रानीखेत में आयोजित संगोष्ठी में देशभर से आए वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक आयुर्वेदिक अनुसंधान के समन्वय पर जोर दिया। वैज्ञानिकों का कहना था कि स्थानीय ज्ञान प्रणालियों से प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा मिलता है और एथ्नो-बॉटनी का फील्ड-आधारित अनुभव जब आयुर्वेद के द्रव्यगुण, रसायन चिकित्सा और समग्र स्वास्थ्य अवधारणाओं से जुड़ता है, तो औषधि विकास और एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं को नए आयाम मिलते हैं।
शुक्रवार को आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छावनी परिषद रानीखेत के अधिशासी अधिकारी कुणाल रोहिला ने आयुर्वेद को प्राचीन व प्रभावी चिकित्सा पद्धति बताते हुए कहा कि आयुर्वेदिक दवाओं के प्रति लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है। उन्होंने संगोष्ठी को शोधार्थियों के लिए उपयोगी बताया। सीडीआरआई लखनऊ की पूर्व निदेशक डॉ. मधु दीक्षित ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में नए आविष्कारों और आधुनिक उपकरणों ने स्वास्थ्य विज्ञान में क्रांति लाई है, जिससे औषधीय वनस्पतियों का महत्व और बढ़ गया है।
सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. रबिनारायण आचार्य ने वर्चुअल संबोधन में कहा कि यह सेमिनार पारंपरिक भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के साथ वैश्विक स्वास्थ्य विज्ञान में भी योगदान देगा। डीएसबी महाविद्यालय नैनीताल के वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी ने कहा कि आयुर्वेद दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति है और कोरोनाकाल ने औषधीय पौधों के महत्व को पूरे विश्व के सामने स्थापित किया है। कार्यक्रम में सहायक निदेशक डॉ. ओमप्रकाश, डा. गजेंद्र राव, डा. वीबी कुमावत, डा. दीपशिखा आर्या, डा. तरुण कुमार, डॉ हरित कुमारी, विनोद चौधरी सहित कई शोधकर्ता और विशेषज्ञ मौजूद रहे।