अल्मोड़ा। कुमाऊंनी भाषा के सिरमौर कवि, साहित्यकार और कुमाऊंनी पत्रिका दुदबोलि के संपादक मथुरा दत्त मठपाल का निधन कुमाऊंनी साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने अंतिम सांस तक मातृभाषा कुमाऊंनी की सेवा की। अपनी कलम से कुमाऊंनी भाषा साहित्य को बुलंदियों तक पहुंचाया। कई बार वह पत्रिका के प्रकाशन में अपनी पेंशन तक खर्च कर देते थे।
उनका जन्म 29 जून 1941 को जिले के भिकियासैंण तहसील क्षेत्र के नौला गांव में स्व. कांति देवी मठपाल और स्व. हरी दत्त मठपाल के घर हुआ था। उन्होंने तीन विषयों में एमए, बीटीसी किया था। 35 सालों तक माध्यमिक शिक्षा से जुड़े रहे। वर्ष 1997 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर पूरा जीवन कुमाऊंनी भाषा के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
उन्होंने लेखन की शुरुआत तो हिंदी भाषा से की लेकिन वर्ष 1985 से वह निरंतर कुमाऊंनी में लेखन कर रहे थे। वर्ष 2000 से वह कुमाऊंनी पत्रिका दुदबोलि निकाल रहे थे। उन्होंने दुदबोलि पत्रिका के माध्यम से कुमाऊंनी भाषा साहित्य को नई पहचान दिलाने के साथ ही इसे बुलंदियों तक पहुंचाया। वरिष्ठ रचनाकारों की रचनाएं छापने के साथ ही नवोदित रचनाकारों को भी आगे बढ़ाने में उनका अहम योगदान रहा है।
वरिष्ठ साहित्यकार और पहरू कुमाऊंनी मासिक पत्रिका के संपादक डॉ. हयात सिंह रावत ने बताया कि मठपाल पुराने कुमाऊंनी साहित्यकारों की दुर्लभ रचनाओं को खोज-खोज कर दुदबोलि पत्रिका में छापते थे। ‘कौ सुआ, काथ कौ’ पुस्तक के जरिये 100 कहानीकारों की 100 कहानियों को पाठकों के सामने लाए।
कुमाऊंनी कवियों पर भी उनकी ऐसी ही एक पुस्तक संकलन की योजना थी जो उनके निधन के बाद अधूरी ही रह गई। उन्होंने अपनी पत्रिका के माध्यम से कई लोगों को कुमाऊंनी भाषा में लेखन के लिए प्रेरित किया। उनकी रचनाएं प्रकाशित कीं। डॉ. रावत ने बताया कि पहरू ने जून 2020 में मथुरा दत्त मठपाल पर विशेषांक निकाला था। अब तो उनसे जुड़ी यादें ही शेष रह गई हैं। उनका यूं ही चले जाना कुमाऊंनी साहित्य के लिए बड़ा झटका है। (संवाद)
मथुरा दत्त मठपाल की प्रमुख रचनाएं
- आड.-आड. चिचैल हैगो
- पै मैं क्यापक क्याप्त कै भैटुनू
- मनख सतसई
- फिर प्योलि हंसैं
- राम नाम भौत ठुल
- था मेरा घर भी यहीं कहीं
- कौ सुवा काथ कौ
तमिलनाडु में कुमाऊंनी भाषा में रखी थी अपनी बात
अल्मोड़ा/रामनगर। मथुरा दत्त मठपाल को कुमाऊंनी भाषा से बेहद लगाव था। साहित्य अकादमी की ओर से कोयंबटूर (तमिलनाडु) में अगस्त 2015 में आयोजित सम्मान समारोह में भी मठपाल ने कुमाऊंनी भाषा में ही अपनी बात रखी थी। उन्होंने कुमांऊनी की विशेषताओं पर प्रकाश डाला और कुमाऊंनी साहित्य के दो सौ साल की लिखित परंपरा की जानकारी दी।
वक्तव्य का अकादमी की ओर से हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद कराया गया। वक्तव्य का अंत कुमाऊं में त्योहारों के अवसर पर दी जाने वाली मंगलकामना जीते रहो, जागते रहो, सिंह के भांति ऊर्जावान रहो, सियार की भांति चतुर रहो, मरने तक माता-पिता को याद करना, दूब की भांति पनपना, धरती के बराबर चौड़े हो जाना, आकाश के बराबर ऊंचे तिष्ठना-पनपना से किया।
उनका मानना था कि मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है। अनेक प्रकार का ज्ञान सभी देशों से जरूर लेना चाहिए लेकिन उसका प्रचार मातृभाषा से ही करना चाहिए।
सम्मान समारोह में साहित्य अकादमी ने उनको भाषा सम्मान से नवाजा। 16 अगस्त को हिंदी अकादमी उपाध्यक्ष चंद्रशेखर कांबार ने ताम्रपत्र, शॉल और 50 हजार रुपये की नगद राशि प्रदान की। मठपाल के साथ हल्द्वानी के चारू चंद्र पांडे को भी संयुक्त रूप से यह सम्मान दिया जाना था, लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण चारु चंद्र कार्यक्रम में नहीं पहुंच सके। कुमाऊंनी भाषा में कार्य के लिये पहली बार यह सम्मान प्रदान किया गया।
मठपाल के निधन से साहित्य जगत में शोक
रामनगर। कुमाऊंनी साहित्यकार मथुरा दत्त मठपाल ने निधन पर साहित्य जगत में शोक व्याप्त है। तमाम साहित्यकारों ने मठपाल के योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।
कुमाऊंनी साहित्यिक पत्रकारिता की जब भी चर्चा होगी तब स्व. मथुरा दत्त मठपाल जी के अवदान को बहुत श्रद्धापूर्वक याद किया जाएगा। अल्मोड़ा से प्रकाशित अचल पत्रिका की ऐतिहासिक भूमिका के बाद दुदबोलि पत्रिका के माध्यम से मठपाल जी ने जो स्तरीय प्रकाशन किया, वह उनकी विद्वता, काव्य संस्कार और भाषा के असामान्य ज्ञान के कारण ही संभव हो पाया।
- शेखर जोशी, हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार।
उनकी संगत और स्नेह में मेरे भीतर भी कुमाऊंनी की समझ विकसित हुई। कुमाऊंनी के ध्वन्यात्मक विन्यास का रचाव, जैसा उनकी कविता में पाया, वैसा और कहीं नहीं। आज भी अपने आसपास शोषण, अन्याय, अधर्म और छल-कपट की सड़ांध पाता हूं, तो उनकी कविता याद आती है- आँग-आँग चिचैल हैगो.......।
- प्रो. शिरीष मौर्य, हिंदी विभाग के प्रोफेसर, डीएसबी कॉलेज नैनीताल।
यह भी सोच रहा हूं, अब यदि पहाड़ गया भी तो किसी से न कविता, इतिहास की पुस्तकें पढ़ने को मिलेंगी और न दुदबोलि पत्रिका के अंक ही उस रूप में मिलेंगे। संवाद की तो अब भाषा ही बदल जाएगी। ऐसी महाविभूति का चुपके-चुपके चला जाना पीड़ादायक के साथ मुझे स्तबध तो करता ही है। विनम्र श्रद्धांजलि!
- हरिसुमन बिष्ट, साहित्यकार
कुमाऊंनी के इनसाइक्लोपीडिया अनंत यात्रा पर निकल गए। सादर नमन दुदबोलि के संपादक!
- ज्ञान पंत, साहित्यकार
एक सितंबर 2019 को स्वर साधना संगीत विद्यालय रामनगर की ओर से आयोजित रंग-ए-बनारस में बाबूजी मथुरा दत्त मठपाल के सानिध्य में तमाम मुद्दों पर बातचीत हुई थी। लोक साहित्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। टीम नेकी की दीवार और उत्तराखंड लेखपाल संघ की ओर से बाबूजी को विनम्र श्रद्धांजलि।
- तारा चंद्र घिल्डियाल जिलाध्यक्ष, उत्तराखंड लेखपाल संघ
जनप्रतिनिधियों, शिक्षक संगठनों ने भी जताया शोक
रामनगर। विधायक दीवान सिंह बिष्ट, पूर्व विधायक रणजीत रावत, पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी, ब्लॉक प्रमुख रेखा रावत, सांसद प्रतिनिधि इंदर रावत, डॉ. निशांत पपनै, राकेश नैनवाल, नरेंद्र शर्मा के अलावा शिक्षक संगठनों ने मथुरा दत्त मठपाल ने निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।