कुमाउंनी भाषा को कक्षा एक से दसवीं के पाठ्यक्रम में लागू करने की कवायद शुरू हो गई है। अल्मोड़ा डायट में शुरू हुई छह दिवसीय कार्यशाला में शिक्षक उत्तराखंड को जानो कुमाउंनी लोक भाषा साहित्य निर्माण के लिए विचार विमर्श करेंगे। कार्यशाला में कुमाउंनी भाषा से संबंधित संबोधों का चिन्हीकरण कर बच्चों के अधिगम स्तर के अनुरूप पाठ्यक्रम बनाया जाएगा।
कुमाउंनी लोकभाषा पाठ्यक्रम कक्षा एक से दस तक लागू किया जाना है। पाठ्यक्रम निर्माण के लिए कार्यशाला में अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, नैनीताल के 35 शिक्षक भाग ले रहे हैं। कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए निदेशक अकादमिक शोध प्रशिक्षण एवं मूल्यांकन डॉ. कुसुम पंत ने कहा कि कुमाउंनी भाषा उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान है। प्रदेश में बोली जाने वाली कुमाउंनी, गढ़वाली, रं, जौनसारी, लोकभाषाओं का सामाजिक परिवेश विविधतापूर्ण है। स्थानीय परिवेश में इनके महत्व को दृष्टिगत रखते हुए स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में इनका समावेश किया जाए। जिससे उत्तराखंड के बच्चे एक-दूसरे की लोकभाषाओं, परिवेश, संस्कृति के प्रति सम्मान भाव रख सकें। बच्चों को मातृभाषा के प्रति संकोच नहीं गर्व का अनुभव करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शासन से मॉडल प्राइमरी स्कूलों में प्रति कक्षा एक शिक्षक की व्यवस्था की जा रही है। डायट के प्राचार्य डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा कि उत्तराखंड की राजभाषा हिंदी, द्वितीय राजभाषा संस्कृत है। प्रदेश में विभिन्न लोकभाषाएं बोली जाती हैं। जिन्हें स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल कर संरक्षित, संवर्द्धित किया जा सकता है। दिनेश सिंह बिष्ट ने संचालन किया। कार्यक्रम में नोडल समन्वयक डॉ. हरीश जोशी, गोपाल सिंह गैड़ा, विनय थपलियाल, डॉ. हयात सिंह रावत, उदय किरौला, प्रो. प्रभा पंत, जेके जोशी, जीजी गोस्वामी, हरेंद्र सिंह बिष्ट, डॉ. कुंदन सिंह रावत, महेंद्र भंडारी, केएस रावत, लता भोज, डॉ. सरिता पांडे, ललित मोहन पांडे, पुष्पा जोशी, कैलाश डोलिया, डॉ. बृजेश डसीला, भारती भट्ट, नवीन चंद्र ओली आदि मौजूद थे।