कुमाऊंनी रामलीला पर यह लेख 1970 के दशक में प्रमुख साहित्यकार इलाचंद्र जोशी की प्रेरणा से लिखा गया था। तब आकाशवाणी लखनऊ से इसे रेडियो पर प्रसारित किया गया था। लेखक चारु चंद्र पांडे के प्रयास से ही कुमाऊंनी साहित्यकार गौर्दा की रचनाएं छप सकीं थीं। पांडे जी को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान समेत साहित्य अकादेमी आदि संस्थाओं से भी सम्मानित किया जा चुका है। 94 वर्षीय चारु आजकल अस्वस्थ हैं। ऊंचापुल निवासी उनके पुत्र भूतपूर्व सेनाधिकारी मुकुल कुमार पांडे ने यह लेख उपलब्ध कराया है।
कुमाऊं में नए व्यक्तियों, वस्तुओं, विचारों को ग्रहण करने और उन्हें अपने में मिलाने की अद्भुत शक्ति रही है। जीवन के विभिन्न उपयोगी तत्वों को जहां से भी हो प्राप्त करके अपना लेना यहां के जनमानस की विशेषता रही है। बाहर से आए लोगों, उनकी परंपराओं, उनके गीतों, उनके रीति-रिवाज, मान्यताओं को यहां के लोगों ने आदर दिया और उन्हें अपनी संस्कृति में मिला लिया। स्वयं भी उन्होंने बाहर जाकर भारत के सांस्कृतिक केंद्रों, तीर्थों, व्यापार की मंडियों आदि प्रमुख स्थानों का भ्रमण करके अपना ज्ञान बढ़ाया।
यहां के संपन्न वर्ग के लोग भी कई शहरों में यात्रा पर जाते थे। रजवाड़ों के पौरोहित्य, भ्रमण सुख, योगाभ्यास, ज्ञानार्जन, अध्ययन, जीविकोपार्जन आदि हेतु कई दिनों तक पैदल भ्रमण करते हुए वह बहुत दूर मैदानों की ओर निकल पड़ते थे। जब वे लोग लौटते थे तो अपने साथ कई नई वस्तुएं, नए विचार, नए सांस्कृतिक संस्कार भी लाते थे। यहां के कुछ विद्वानों ने काशी की रामलीला का रूप देखा, पारसी थिएटर कंपनियों के नाटक देखे। अपने प्राचीन नाट्य ग्रंथों का मनन किया। उनकी कल्पना बड़ी प्रखर थी।
उन्होंने संगीत का आधार लेकर नई प्रणाली पर रामलीला की नींव डाली, और कुमाऊं को एक ऐसी चीज दे गए जो अपनी लोकप्रियता में अद्वितीय है और यहां की जनता का कंठहार बनी है। पिछले डेढ़ सौ से अधिक वर्षों में कुमाऊं के लोकजीवन आदर्श को संभवत: रामलीला ने ही सबसे अधिक प्रभावित किया। ब्रिटिश काल में उच्च पदों पर नियुक्त कुमाऊंनी अफसरों ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने रामलीला को काफी प्रोत्साहन दिया।
समाज के संगीत कला प्रेमी आगे बढ़े और उन्होंने कुमाऊं की रामलीला को कुछ इस तरह सुबद्ध और सुगठित रूप दिया कि वह उसकी अपनी मौलिक संपत्ति, प्रादेशिक संस्कृति की अभिन्न इकाई बन गई क्योंकि यह अनुभव की विभिन्नता, संगीत की मधुरता भारतीय-पारसिक नाट्य शैलियों को शास्त्रीय स्वरों और आधुनिक तर्जों को उस खूबी के साथ अन्यत्र कहीं नहीं गूंथा जा सकता जैसा कुमाऊंनी रामलीला में देखने को मिलता है। कहा जाता है कि मके ड़ी गांव में रहने वाले डिप्टी कलेक्टर देवी दत्त जोशी ने यहां रामलीला की नींव डाली।
बाद में कुंदन लाल चकुड़ायत, दुर्गादास, प्रयाग दत्त चौधरी, राम दत्त ज्योतिषी, पुरुषोत्तम, शिवदत्त, गौरी दत्त पांडे, गोविंद लाल साह आदि के प्रयासों से रामलीला को बल मिला। कई सज्जनों ने रामलीला नाटक का संपादन और प्रकाशन भी किया। इनकी नए और पुराने संस्करणों में काफी अंतर आ गया है। यह परिवर्तन परिष्कार के लिए भी किया गया है। जिस कारण रामलीलाओं में गाए जाने वाले गीत सब जगह एक जैसे नहीं मिलते।
रामलीला नाटक में रामचरितमानस से कवि उक्ति छोड़ संवादरूप दोहा, चौपाई को भी स्थान दिया गया। कुछ छंद और संस्कृत के श्लोक भी लिए गए। गीतों की नई-नई धुनें बाहर से लाकर उन्हें सरल शब्दों में जड़ दिया गया। इन गीतों का काव्य पक्ष निखरा हुआ है। भाषा भाव छंद, यति आदि संबंधी दोष भी पर्याप्त मात्रा में हैं क्योंकि इन्हें कई लोगों ने बदला है। इससे खिचड़ी बन गई है लेकिन इस खिचड़ी ने भी एक विचित्र ही स्वाद दिया है।