रानीखेत (अल्मोड़ा)। कुमाऊं-गढ़वाल की सीमा पर स्थित सिमलचौरा में मां नंदा देवी महोत्सव (पाती कौतिक) कृष्ण जन्माष्टमी के दही हांडी फोड़ की तर्ज पर मनाया जाता है। फर्क इतना है कि दही हांडी के स्थान पर ग्रामीण जंगल से आमंत्रित विशालकाय चीड़ के पेड़ काटकर मेला स्थल पर लाते हैं, यहां पेड़ की पूजा-अर्चना के बाद पेड़ की अंतिम सिरे पर इनामी धनराशि की पोटली बांधी जाती है, इसके बाद शुरू होता है गोविंदाओं की तर्ज पर इनामी धनराशि झटकने की प्रतियोगिता।
इस साल यह प्रतियोगिता पड़ोसी गांव जड़पानी निवासी सुनील कुमार ने जीती। स्याल्दे तहसील के सुदूरवर्ती सिमलचौरा गांव में गुसांई चंद लोग मां नंदा देवी के महोत्सव को प्राचीन काल से ही पाती कौतिक के रूप में मनाते आ रहे हैं। बताते हैं कि कृष्ण जन्माष्टमी को मां नंदा मायके आती है तो शाम को मायके से ससुराल को विदाई के वक्त मां नंदा को फूल, पाती से पूजा कर विदा किया जाता है। मायके वाले पाती कौतिक मनाते हैं।
अष्टमी के दिन ग्रामीण सुबह पूजा, अर्चना के बाद जंगल से विशालकाय चीड़ का पेड़ आमंत्रित कर उसे काटते हैं, पेड़ को इस तरह सावधानी से काटा जाता है कि उसकी टहनियां न टूटें। पेड़ को ग्रामीणों के सहयोग से मेला स्थल लाया जाता है। पूरी छाल निकालकर पेड़ में दूब घास और पत्तियां लपेटी जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता विजय उनियाल ने बताया कि जागर के साथ अवतरित देवता पेड़ की परिक्रमा करते हैं।
इसके बाद दही हांडी फोड़ की तर्ज पर प्रतियोगिता शुरू होती है। पेड़ की टहनी पर स्वेच्छा पूर्वक धनराशि की पोटली टांग दी जाती है। इस साल 63 फीट लंबे चीड़ के पेड़ पर यह पोटली टांगी गई थी। आसपास के ग्रामीण युवाओं की टोलियों के बीच धनराशि निकालने की प्रतिस्पर्धा शुरू होती है।
एक-दूसरे को पछाड़ने का यह खेल काफी उत्साहजनक रहता है। इस बीच पाती कौतिक के तहत मेला स्थल पर पूजा-अर्चना चलती रहती है। प्रधान खिल्पा देवी, शेर सिंह, गोपाल सिंह, कुंदन सिंह, सूरज सिंह, प्रताप सिंह, कमल सिंह, धन सिंह, हरीश सिंह, दीवान सिंह, देव सिंह, भगत सिंह, हयात सिंह, खीम सिंह, नंदन सिंह, सुरेश नेगी, आनंद बल्लभ आदि ने सहयोग किया।