कामदेव को वसंत ऋतु का राजा माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि वसंत ऋतु के दौरान प्रकृति में उल्लास और मधुरता कामदेव के कारण ही आती है। शास्त्रों के मुताबिक कामदेव को भगवान शिव ने भस्म कर दिया था इसलिए आम तौर पर कामदेव के पूजन की परंपरा नहीं रही है।
उत्तराखंड में भी कामदेव का कोई मंदिर नहीं है, लेकिन तीन दशक पहले कत्यूरघाटी क्षेत्र में कामदेव की दसवीं शताब्दी की एक दुर्लभ मूर्ति मिली। यह मूर्ति अब अल्मोड़ा में स्थित राजकीय संग्रहालय में मौजूद है। उत्तराखंड में कामदेव की यह एकमात्र मूर्ति मानी जाती है।
जिससे यह माना जाता है कि इस इलाके में कभी कामदेव का कोई मंदिर अवश्य रहा होगा। तपस्या भंग करने पर भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म कर दिए जाने की कथा शास्त्रों में काफी लोकप्रिय है। हिंदू धर्म में कामदेव को अशरीर माना जाता है।
वह किसी विशेष अंग में न रहकर जीवन को ऊर्जावान और मधुर बनाने के लिए प्रकृति के बदलते स्वरूप में खुद के मौजूद रहने का अहसास कराते रहते हैं।
आमतौर पर कामदेव का न पूजन होता है और न ही उनका कोई मंदिर मिलता है, लेकिन कत्यूर घाटी में गरुड़ (बैजनाथ) के पास गढ़सेर गांव में खुदाई के दौरान पुरातत्व विभाग के लोगों को 1984-85 में कामदेव की एक दुर्लभ मूर्ति प्राप्त हुई।
पुराविद कौशल किशोर सक्सेना बताते हैं कि इस स्थान पर तब मंदिर के अवशेष भी मिले थे जिससे यह माना जाता है कि यहां कामदेव का कोई मंदिर अवश्य रहा होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि बैजनाथ (कत्यूर घाटी) को कत्यूर शासकों की राजधानी भी माना जाता है। इस इलाके में कत्यूर काल के कई मंदिर और मूर्तियां आदि आज भी मौजूद हैं।
पत्थर की बनी कामदेव की यह मूर्ति दसवीं शताब्दी की है। यह मूर्ति शिल्प कला की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस प्रतिमा में कामदेव कमल और ललित आसन में हैं। उनके दोनों तरफ उनकी पत्नियां प्रीति और रति को त्रिभंग मुद्रा में दर्शाया गया है।
कामदेव के हाथों में मकरध्वज और धनुष है और माथे पर रत्नजड़ित मुकुट पहने हैं। हिंदू शास्त्रों के मुताबिक प्रद्युम्न को कामदेव का दूसरा अवतार माना जाता है। उन्होंने भगवान कृष्ण और रुकमणि के पुत्र के रूप में जन्म लिया। इसी वजह से कुछ विद्वान इसे प्रद्युम्न की मूर्ति भी मानते हैं।