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लाडले मोहन की शहादत को अमर बना दिया मां देबुली देवी ने

Tue, 26 Jul 2016 12:31 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
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कारगिल के अमर शहीद - फोटो : अमर उजाला
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अल्मोड़ा। 1999 में कारगिल युद्ध में शहीद हुए खड़ाऊं गांव के वीर सैनिक मोहन सिंह बिष्ट की वीरता को तो लोग याद करते ही हैं, साथ ही उनकी दिवंगत मां देबुली देवी को भी नहीं भूलते, जिन्होंने सरकार से सहायता के तौर पर मिले सारे पैसों से गांव में मंदिर बनवाकर अपने इकलौते शहीद बेटे की मूर्ति लगवाई है। गांव के लोग खास अवसरों पर मंदिर परिसर में जाकर शहीद मोहन सिंह और उनकी मां देबुली को याद करते हैं।
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अल्मोड़ा तहसील के खड़ाऊं गांव निवासी मोहन चार जुलाई 1999 को कारगिल में शहीद हो गए थे। उनके पिता भीम सिंह का निधन पहले ही हो चुका था। मोहन ही अपने परिवार का अकेला सहारा थे। अनपढ़ मां देबुली ने सरकार से मिले सारे पैसों से अपने बेटे मोहन की स्मृति में गांव में महादेवेश्वर मंदिर के पास राधा-कृष्ण का मंदिर बनवाकर वहां बेटे की मूर्ति लगवाई, जो कि मुंबई में बनवाई गई।

शहीद मोहन सिंह के जीजा शमशेर सिंह मेहरा ने सहयोग दिया, जो मुंबई में नौसेना में काम करते हैं। मूर्ति के अनावरण के मौके पर शहीद मोहन की पत्नी विमला देवी भी परिवार सहित दिल्ली से गांव आई थी। नौ साल पहले देबुली का निधन हो चुका है और अब गांव में उनके परिवार में कोई नहीं है।
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उनकी पत्नी और बच्चे अब दिल्ली में रहते हैं, हालांकि उनका गांव में आना-जाना रहता है। 1999 में शहादत के समय पत्नी विमला के गर्भ में बेटा पल रहा था। उनके शहीद होने के करीब चार माह बाद उनका बेटा पैदा हुआ जो मां के साथ रहकर दिल्ली में पढ़ाई कर रहा है। दो बड़ी बेटियां भी दिल्ली मेें ही रहती हैं।

अल्मोड़ा। कारगिल युद्ध में जिले से नौ जवान शहीद हुए थे। नगर के शिखर तिराहे पर बने शहीद चौक में शहीद पार्क बनाया गया है, जिसमें जिले के सभी कारगिल शहीदों के नाम अंकित हैं। पार्क की दशा खराब है। इसमें कई सालों से रंग-रोगन नहीं किया गया है। पार्क की रेलिंग कुछ लोगों के कपड़े सुखाने के काम आती है। इस पार्क में कारगिल युद्ध में शहीद हुए जिले के सभी सैनिकों और अर्द्धसैनिकों के नाम दर्ज हैं।

अल्मोड़ा। 1999 के कारगिल युद्ध में शहीद जवानों को तत्कालीन केंद्र, प्रदेश सरकार ने काफी मदद दी थी, लेकिन अर्द्धसैनिक बलों के शहीदों की अनदेखी हुई। प्रदेश सरकार के कई मंत्रियों ने अल्मोड़ा के गंगोला मोहल्ला निवासी आईटीबीपी के शहीद कैलाश रौतेला की स्मृति में किसी सरकारी संस्थान का नाम रखने, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वायदा किया था, जो अधूरा रहा।
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