पर्यटन नगरी में खत्म हो रहे मेलों के स्वरूप को उर्स ने कुछ हद तक जिंदा रखने का काम किया है। बड़े मेलों की परंपरा यहां 2003 के बाद बंद हो चुकी हैं। उर्स अब तीन के बजाय चार दिनों तक मनाया जाता है। विभिन्न समुदाय के हजारों लोगों की कालू सैय्यद बाबा पर अगाध आस्था है, जिस कारण इस समारोह को गंगा-जमुनी तहजीब की संज्ञा दी गई है। चार दिवसीय इस समारोह में हजारों लोग बाबा की मजार पर शीश नवाते हैं और मन्नत पूरी होने पर मजार पर चादर चढ़ाते हैं।
मालूम हो कि पर्यटन नगरी में 2003 से शरदोत्सव, ग्रीष्मोत्सव बंद हो गए हैं। हालांकि 2016 और 17 में स्थानीय नागरिकों के प्रयासों से उत्सव हुए, लेकिन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की खास दिलचस्पी नहीं दिखने के कारण अब यह उत्सव फिर से बंद हो चुके हैं। उत्सवों के बंद होने से जहां सांस्कृतिक और खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल पाता, वहीं मनोरंजन के साधनों का भी अभाव है। इसीलिए लोग हजरत कालू सैय्यद बाबा की मजार पर हर साल उर्स समारोह को ही मेले का रूप देते हैं। समारोह में दुकानें, झूला, चरखा सहित मनोरंजन के तमाम साधन उपलब्ध रहते हैं।
दूसरी तरफ बाबा के अकीदतमंदों की भी कमी नहीं है। हिंदू, सिख और ईसाई धर्म के लोग हजारों की संख्या में आकर मजार पर शीश नवाते हैं और चादरें चढ़ाते हैं। गुलजार मंजिल निवासी मजार के खादिम उर्स प्रबंधक मो. मोहसिन ने बताया कि 44 साल पहले बाबा ने सपने में उनके पिता मरहूम मो. शमीम को दर्शन दिए थे। तब से यह समारोह मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि बाबा ने कभी भी धर्म और जाति में भेद नहीं किया। जो कभी भी मुश्किल में फंसा, बाबा ने विभिन्न रूपों में प्रकट होकर उसका बेड़ा पार किया है।