काकड़ीघाट में कोसी के किनारे जिस पीपल के पेड़ के नीचे स्वामी विवेकानंद को 1890 की हिमालय यात्रा के दौरान ज्ञान मिला था, वह पेड़ दो साल पहले सूख गया था। उस दुर्लभ पीपल के पेड़ (ज्ञान वृक्ष) से तैयार किए गए प्रतिरूप पौधे का शुक्रवार को उसी स्थान पर रोपण किया गया।
बताया गया कि 1890 में स्वामी विवेकानंद अपने गुरु भाई स्वामी अखंडानंद के साथ नैनीताल से अल्मोड़ा के लिए पैदल निकले थे। स्वामी विवेकानंद काकड़ीघाट में शिव मंदिर के पास पीपल के पेड़ के नीचे ध्यानमग्न हो गए। उसके बाद उन्होंने इस पेड़ के नीचे हुई अनुभूति के बारे में अपने साथी गुरु भाई स्वामी अखंडानंद को बताया।
इस पेड़ के सूखने से पहले ही आईसीएआर, विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा, पंतनगर कृषि विवि, सीएएफआरआई ने मूल वृक्ष के कई प्रतिरूप (क्लोन) बनाए थे। जीबी पंत विवि पंतनगर के वैज्ञानिक डॉ. सलिल तिवारी की देखरेख में तैयार हो चुके पौधों में से एक प्रतिरूप पौधे को शुक्रवार को काकड़ीघाट में पुराने पेड़ के पास ही रोपा गया।
जहां डीएम सविन बंसल ने कहा कि काकड़ीघाट में पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त करने के बाद 19 और 26 जनवरी 1896 को अमेरिका में दिए गए अपने व्याख्यान में स्वामी विवेकानंद ने काकड़ीघाट में हुई अनुभूति का उल्लेख किया था। कहा कि इस दुर्लभ पौधे के संरक्षण के लिए जिला प्रशासन पूरा सहयोग करेगा।
आईसीएआर के पूर्व महानिदेशक डॉ. एस अयप्पन ने भी इस पौधे को संरक्षित करने के साथ ही स्वामी विवेकानंद के विचारों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी ने काठगोदाम से अल्मोड़ा तक स्वामी विवेकानंद से जुड़े सभी स्थलों को विकसित करने को व्यापक प्रचार, प्रसार पर जोर दिया।
सभी प्रमुख स्थानों पर बड़े साइन बोर्ड लगाने का भी सुझाव दिया। विभुकृष्णा ने संचालन किया। प्रदेश के राज्यपाल केके पॉल के संदेश को डीएम बंसल ने पढ़ा। कहा कि इस पौधे का रोपण स्वामी विवेकानंद के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए युवा पीढ़ी को प्रेरणा देगा। इस दौरान वीपीकेएएस के निदेशक डॉ. ए पटनायक, पूर्व निदेशक डॉ. जेसी भट्ट, रामकृष्ण कुटीर के स्वामी सोमदेवानंद, डॉ. बीएस बिष्ट, डॉ. दिवा भट्ट, एसके घोष, रामकृष्ण मिशन बेलूर मठ से आए महासचिव बल भद्रानंद, प्राणानंद आदि थे।