सुदूरवर्ती नैथना देवी में पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं हैं। यहां देवी शक्तिपीठ पर लोगों की गहरी आस्था है। नैथना देवी में गोरखा शासकों द्वारा निर्मित किले भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे, लेकिन अब इस किले के अवशेष मात्र रह गए हैं। धरोहरों को संवारने की दिशा में आज तक सार्थक पहल नहीं हुई है। पर्यटन विभाग अगर इस क्षेत्र को विकसित करे तो यह धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित हो सकता है।
नैथना देवी मंदिर नौबाड़ा गांव के ठीक ऊपर रमणीक और ऊंचे पर्वत शिखर पर बसा हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट दिनेश तिवारी ने बताया कि नैथना मंदिर दूनागिरि और मानिला मंदिर के समकालीन माना जाता है। कत्यूरी शासन से पूर्व इन मंदिरों की स्थापना हो चुकी थी। कुमाऊंनी कवि विशन दत्त जोशी शैलज बताते हैं कि नैथना देवी शक्ति पीठ के प्रति लोगों में गहन आस्था है
। प्रतिवर्ष भाद्र मास की घृत संक्रांत्रि पर यहां मेला लगता है। नैथना मंदिर शिखर से हिमालय और अन्य पर्वतमालाओं से लेकर तराई तक के विहंगम दृश्य नजर आते हैं। मंदिर से 100 मीटर की दूरी पर गोरखों द्वारा बनाए गए किलों के अवशेष हैं। गोरखा शासकों ने नीचे स्थित पाली गांव में मुख्यालय बनाया था और सुरक्षा की दृष्टि से इस ऊंचे स्थल पर किलों का निर्माण कराया था। ग्रामीणों के अनुसार दो दशक पूर्व तक किलों की दीवारें सुरक्षित थीं। धीरे-धीरे लोगों ने किले के पत्थर उठा लिए। जिस कारण इनका अस्तित्व मिटता चला गया। नैथना देवी मंदिर का जन सहयोग से अब सुंदरीकरण हो चुका है।
-कैसे पहुंचे यहां तक-
नैथना देवी मंदिर तक पहुंचने के लिए रानीखेत से द्वाराहाट 30 किमी, द्वाराहाट से चंथरिया और नौबाड़ा जाना पड़ता है। रानीखेत से इस मंदिर समूह की दूरी लगभग 60 किमी है।