हंसी, ठिठोली, मतवालापन, सौंदर्य के साथ बंसत ऋतु के यौवन की मिठास होली पर्व में सब कुछ समाहित है। यहां सिर्फ पुरुषों की बात करना बेइमानी होगी। पहाड़ की होली महिलाओं की भागीदारी के बिना अधूरी है चाहे वह खड़ी होली हो या बैठकी होली।
पुरुषों की बैठकी होली, खड़ी होली और महिलाओं की होली के कई गीत दोनों ही महफिलों में गाए जाते हैं। उत्तराखंड के जनकवि और प्रसिद्ध रंगकर्मी स्व. गिरीश तिवारी गिर्दा ने एक पुस्तक में लिखा भी है कि होली का एक स्वरूप महिलाओं की होली भी है और यह बात निसंकोच स्वीकारी जानी चाहिए कि महिलाओं की होलियां स्वतंत्र अध्ययन की मांग करती हैं। काहे करत तकरार,गरबा लगा ले, रह गए अब तो सावन के दिन चार, कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें महिला गायक और पुरुष दोनों ही महफिलों में गाना पसंद करते हैं और श्रोताओं को भी रस और आनंद से भरी होलियां ही पसंद आती हैं।
महिलाएं एकादशी से होली के टीके तक घर-घर में होली बैठकों का आयोजन करती आई हैं और होली गीतों के साथ ही स्वांग (व्यंग) का भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करती हैं। समाज में आए परिवर्तन या फिर जिस घर में होली हो रही है, उस परिवार के सदस्यों की वेशभूषा पहन कर, उनके बोलचाल को लेकर होली स्वांग का प्रदर्शन किया जाता है। सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर लिखने वाले चंद्रशेखर तिवारी लिखते हैं कि महिलाओं की होली रंगीली होने के साथ साथ गुदगुदाने वाली होती है। स्वांग करने में महिलाओं का कोई सानी नहीं है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. इला साह बताती हैं कि कुमाऊंनी महिलाएं संस्कृति के मामले में काफी सशक्त हैं। वह कहती हैं कि त्योहारों को संरक्षित करने का काम ही महिलाओं ने किया है। पुरुषों के वर्चस्व वाले त्योहार होली को महिलाओं ने जिस खूबी से बचा के रखा है वह प्रशंसनीय है। क्योंकि घरों की बुजुर्ग और सयानी महिलाएं घर की बेटी-बहुओं को सामूहिक पर्वों और त्योहारों में अपने साथ ले जाती हैं। वहीं पुरुषों में यह सिलसिला कम हो रहा है, चाहे वो पिता पुत्र के बीच हो या भाई भाई के बीच।