समय बदला, होली खेलने के तौर-तरीके बदले, लेकिन होली के गुड़ की परंपरा नहीं बदली। इसका स्वाद ही निराला है। इसी कारण होली गायन के बाद होल्यारों को आज भी मिठाई के रूप में गुड़ बांटा जाता है।
होली की चतुर्दशी के अगले दिन होल्यार अपने गांव में बाजे-गाजों, ध्वजाओं के साथ गांवों में घूमते है। गांव के हर घर में जाकर होली गायन करते है। होली गायन के बाद हर परिवार होली के डांगर को गुड़ की एक भेली होल्यारों को बांटने के लिए देते है। पहाड़ के गांवों में होली के दिन होल्यार दिनभर होली गाने के बाद गुड़ खाते हैं।
बुजुर्गों का कहना है कि पहाड़ में होली की मिठाई गुड़ है। बूंगा गांव निवासी बुजुर्ग ठाकुर सिंह का कहना है कि उन्होंने बचपन से गांव में हमेशा होली देखी तब से होली के दिन होल्यारों को गुड़ बांटते देख रहे हैं। बैजनाथ गांव निवासी बंशी गिरी का कहना है कि छलड़ी को हर गांव की होली की चौपाल में हलुवा बनता है। हलुवा प्रसाद के रुप में हर परिवार को बांटा जाता है।