अल्मोड़ा। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में होली का इतिहास यूं ही समृद्ध नहीं रहा है। यहां की एक हवेली ऐसी है जहां छह माह होली तो छह माह दिवाली मनाई जाती थी जिसमें जिले के लोग बड़ी संख्या में जुटते थे। करीब 20 वर्ष पूर्व यह परंपरा टूट गई जिसे दोबारा शुरू करने के प्रयास हो रहे हैं।
जानकारों और रंगकर्मियों के मुताबिक नगर के धारानौला के पास स्थित अंग्रेजों के शासनकाल में बनी हवेली शिव सदन में छह माह होली और छह माह दिवाली मनाने की परंपरा रही है। आजादी के बाद वर्ष 1948 से यहां यह परंपरा शिव भवन के मालिक शिव दत्त पांडे ने शुरू की। उनके बेटे आकाशवाणी दिल्ली में चीफ इंजीनियर रहे गिरीश चंद्र पांडे और वरिष्ठ रंगकर्मी नारायण सिंह थापा ने बताया कि अपनी संस्कृति को सहेजने एवं इसका प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से उन्होंने इस परंपरा की शुरुआत की थी।
हिंदू कैलेंडर के मुताबिक पूस माह के प्रथम रविवार से महिलाओं और पुरुषों की बैठकी होली का आयोजन होता था जो अगले छह माह तक चलता था। यहां स्थित बड़े हॉल में पुरुष बैठकी तो आंगन में महिलाएं खड़ी होली का गायन करती थीं। हर रोज जिले के विभिन्न हिस्सों से होल्यार, रंग कर्मी और संस्कृति प्रेमी यहां पहुंचकर दो से तीन घंटे होली गायन करते थे। अगले छह माह तक हवेली को फूलों से सजाकर यहां दिवाली मनाई जाती थी। मिठाई का वितरण होता था और महिलाएं और पुुरुष यहां एकत्र होकर भजन-कीर्तन भी करते थे।
इस दौरान हवेली दीपों से जगमग रहती थी और दिवाली सा माहौल रहता था। वर्ष 1958 में शिव दत्त पांडे के निधन के बाद उनके परिवार ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया लेकिन गिरीश चंद्र पांडे सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 1999 में परिवार के साथ दिल्ली चले गए। उनके यहां से जाने के बाद इस अनूठी परंपरा पर विराम लग गया। पांडे ने बताया कि अल्मोड़ा में होली का इतिहास पुराना है। इसे बचाने के लिए वह अपने परिवार से फिर से इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का अनुरोध कर रहे हैं।
बेटी रेनू ने कहा, वह शुरू करेंगी होली की परंपरा
अल्मोड़ा। वर्तमान में लखनऊ में रहने वाली गिरीश चंद्र पांडे की बेटी रेनू को भी कुमाऊंनी संस्कृति से बेहद लगाव है। वह पहाड़ी होली की कायल हैं। अपने पिता की इस अनूठी परंपरा को उन्होंने फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। उन्होंने बताया कि अगले वर्ष वह शिव सदन में फिर से होली गायन की शुरुआत करेंगी। बताया पूर्व की तरह छह माह तक इस आयोजन को कर पाना संभव नहीं होगा लेकिन वह निश्चित तौर पर महिलाओं और पुरुषों की होली का आयोजन यहां करेंगीं।
मेरे पिता ने छह माह होली और छह माह दिवाली मनाने की परंपरा शुरू की थी जो बंद हो गई है। हमारी कुमाऊंनी संस्कृति अनूठी है। अल्मोड़ा में होली का इतिहास समृद्ध रहा है। मैं अपने परिवार से फिर से इस परंपरा को शुरू करने की अपेक्षा करता हूं ताकि हमारी संस्कृति को बढ़ावा मिल सके। - गिरीश चंद्र पांडे।
मैं शिव भवन का केयर टेकर हूं और इससे मेरा पुराना नाता है। यहां छह माह होली और छह माह दिवाली मनाई जाती थी लेकिन बदलते दौर के साथ यह परंपरा अब बंद हो गई है। - नारायण सिंह थापा, वरिष्ठ रंग कर्मी, अल्मोड़ा।
मैंने फिर से शिव भदन में होली मनाने का निर्णय लिया है। अगले वर्ष यहां होली गायन शुरू किया जाएगा। मैं हमारी संस्कृति और अपने बुजुर्गों की परंपरा को आगे बढ़ाना चाहती हूं। निश्चित तौर पर शिव भदन में फिर से होली मनेगी। - रेनू जोशी, लखनऊ।