अल्मोड़ा। उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड जिले के हवालबाग और भैंसियाछाना ब्लॉक में सौ-सौ हेक्टेयर में चाय के बागान विकसित करेगा। इन दोनों ब्लाकों में पहली बार चाय की खेती की जाएगी।
चाय विकास बोर्ड अब तक प्रदेश के पर्वतीय जिलों में 1361 हेक्टेयर क्षेत्रफल में चाय बागान विकसित कर चुका है। अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी में 70, ताकुला में 35, स्याल्दे में छह और चौखुटिया में चार हेक्टेयर क्षेत्रफल में चाय के बगीचे लगाए गए हैं। इस साल हवालबाग और भैंसियाछाना ब्लॉक में सौ-सौ हेक्टेयर क्षेत्रफल में बागान लगाने के लिए सभी तैयारियां कर जिला विकास अधिकारी कार्यालय को प्रस्ताव भेज दिया है। मनरेगा और बोर्ड के माध्यम से यहां चाय की पौध लगाई जाएगी। भविष्य में लमगड़ा, ताड़ीखेत और द्वाराहाट ब्लॉक में चाय की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।
बोर्ड के निदेशक संजय कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि आगामी पांच साल में प्रदेश में एक हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में चाय बागान विकसित करने का लक्ष्य है। इसके तहत पर्वतीय नौ जिलों के 32 ब्लॉकों में 60 लाख पौधों की नर्सरी भी स्थापित की जाएगी। उन्होंने बताया कि केएमवीएन, जीएमवीएन, पर्यटक आवास गृहों, सरकारी कैंटीनों के जरिये भी उत्तराखंड चाय की बिक्री की जाएगी।
जल्द ही फ्लेवर-टी भी बाजार में उतारेगा बोर्ड
अल्मोड़ा। चाय विकास बोर्ड जल्द ही फ्लेवर टी भी बाजार में उतारने जा रहा है। अदरक, तुलसी, हल्दी फ्लेवर में उत्तराखंड टी मिलेगी। चाय बोर्ड के वित्त अधिकारी अनिल खोलिया ने बताया कि दीपावली तक बोर्ड का फ्लेवर-टी बाजार में उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।
नई चाय फैक्ट्री स्थापित करने का काम शुरू
अल्मोड़ा। धौलादेवी विकासखंड में आरतोला में बोर्ड ने चालीस लाख रुपये की लागत से नई चाय फैक्ट्री भी स्थापित करने का कार्य शुरू कर दिया है। इसके लिए जगह चयनित कर ली गई है। इस फैक्ट्री की उत्पादन क्षमता दस हजार किलो प्रतिवर्ष होगी। बोर्ड यहां टी-टूरिज्म को भी बढ़ावा देगा। पर्यटकों और जागेश्वर धाम आने वाले श्रद्धालुओं को चाय बागान और फैक्ट्री का भ्रमण भी कराया जाएगा। बोर्ड ने उद्यान विभाग के निष्प्रयोज्य बगीचों में भी चाय उत्पादन करने को लेकर प्रस्ताव शासन को भेजा है। इसके अंतर्गत उद्यान विभाग के बगीचों की 300 हेक्टेयर जमीन का भूमि परीक्षण करा लिया है।
60 से सौ हेक्टेयर जमीन होनी जरूरी
अल्मोड़ा। चाय के बागान विकसित करने के लिए आसपास के गांवों में करीब 60 से सौ हेक्टेयर की भूमि होनी चाहिए। चाय विकास बोर्ड संबंधित जमीन का भू परीक्षण कराता। परीक्षण में भूमि उपयुक्त होने पर ग्रामीणों को सहमति पत्र देना होता है। इसके बाद बोर्ड प्रबंध कमेटी इस संबंध में प्रस्ताव पास करती है। बोर्ड ग्रामीणों से भूमि तीस साल के लिए लीज पर लेने का अनुबंध करता है। सात साल बाद बगीचे से चाय उत्पादन शुरू होने पर बोर्ड किसानों की ली गई भूमि का किराया अदा करता है। साथ ही बागान स्थापित करने से लेकर तीस साल तक भूमि देने वाले प्रत्येक परिवार के एक व्यक्ति को रोजगार मुहैया कराता है। मनरेगा से 201 रुपये प्रतिदिन सौ दिन तक और बोर्ड के माध्यम से 316 रुपये प्रतिदिन मानदेय दो सौ दिन तक उपलब्ध कराया जाता है।