हरीश कुमार अपनी कलाकृति के साथ।
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दम तोड़ रही काष्ठकला को पुनर्जीवित करने के लिए यहां वन विभाग के संविदा कर्मचारी हरीश कुमार ने पहल की है। उन्हें चीड़ की छाल से कलाकृतियां बनाने में महारथ हासिल है। समय मिलने पर वह युवाओं को लकड़ी से खिलौने बनाने के गुर सिखाते हैं। वह बांस के छिलकों से डलिया अथवा अन्य उपयोग की सामग्री भी बनाते हैं।
ताड़ीखेत ब्लॉक के पथुली गांव निवासी हरीश कुमार ने यह विधा अपने पिता स्व. पन राम से सीखी। वह चीड़ की छाल से खिलौने, मंदिर, घड़ी, लैंप सहित तमाम सामग्री तैयार कर चुके हैं। उनका कहना है कि संरक्षण के अभाव में यह विधा अब दम तोड़ रही है। सरकार को इसे प्रोत्साहन देने की जरूरत है। हरीश समय मिलने पर विद्यालयों में जाकर नौनिहालों को इस विधा की जानकारी देते हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के इच्छुक युवाओं को भी वह तमाम तरह की कलाकृतियां बनाना सिखा चुके हैं। वह कहते हैं कि युवा पीढ़ी को जागरूक करने से यह विधा जिंदा रह सकती है। वह बांस की डलिया बनाना भी जानते हैं। इसके अलावा चीड़ की छाल से हल, हाथी, घोड़ा, टेबल लैंप आदि बनाते हैं, इस कार्य में उनकी पत्नी और बच्चे भी सहयोग करते हैं। हरीश बताते हैं कि जंगल से चीड़ की छाल लाकर उन्हें तराशने में समय लगता है। छाल का मंदिर बनाने में 15 दिन का वक्त लगता है। इसमें फेवीकोल और सेफ्टीपिनों की जरूरत होती है।