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हस्तशिल्प में माहिर पांडे जी

Sun, 15 May 2016 11:37 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
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हस्तशिल्प दिखाते कलाकार - फोटो : अमर उजाला
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अल्मोड़ा। पर्वतीय क्षेत्र में बहुतायत में पाया जाने वाले चीड़ के बगेट (छिलके) को अनुपयोगी माना जाता है। सूखे पेड़ों और झाड़ियों की जड़ों का उपयोग भी केवल जलौनी लकड़ी के तौर पर किया जाता है। लेकिन, यदि प्रारंभिक जानकारी, काम के प्रति जुनून और समर्पण हो तो चीड़ के पेड़ की बगेट तथा अन्य पेड़-पौधों की जडे़ं भी रोजगार का जरिया बन सकती हैं। यह साबित कर दिखाया है नगर के त्यूनरा मोहल्ला निवासी धीरेंद्र कुमार पाठक ने। उनके द्वारा बगेट से बनाई लॉर्ड बुद्धा, मां नंदा-सुनंदा, कालचक्र आदि कृतियां बरबस ही लोगों को आकर्षित करतीं हैं।
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त्यूनरा निवासी धीरेंद्र कुमार पाठक को बचपन से ही पेंटिंग का शौक रहा है। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वह जयपुर चले गए। वर्तमान में वह वहां एक फर्टिलाइजर कंपनी में कार्यरत हैं। नौकरी के दौरान ही पांडे का रुझान वुडन क्राफ्ट की और बढ़ता गया और वह पेड़ की छाल, जड़, तने को आकृतियां देने लगे। जयपुर में इसके लिए उन्हें मनपसंद सामग्री नहीं मिल पाई। जब वह अल्मोड़ा आए तो उन्होंने चीड़ की बगेट से आकृतियां बनाना शुरू किया। 

पांडे कहते हैं कि वह जब भी अल्मोड़ा आते हैं यहां बगेट और जड़ों से आकृतियां तैयार करते हैं और जाते समय अपने साथ जयपुर के लिए भी बगेट ले जाते हैं। उन्होंने अब तक चीड़ की बगेट से भगवान गणेश, बुद्ध, मां नंदा-सुनंदा समेत 50 से अधिक कलाकृतियां तैयार करने के बाद उनमें पालिश कर फ्रेमिंग की है। इसके अलावा जड़ों को तराश कर कैंडल, की-स्टैंड के साथ ही अन्य आकृतियां बनाई है।
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पांडे का सपना है कि बगेट और जड़ों से तैयार हस्तशिल्प सामग्री की दिल्ली की आर्ट गैलरी में प्रदर्शनी लगाएं, ताकि पर्वतीय क्षेत्र के उन्नत हस्तशिल्प को दुनिया में पहचान मिल सके। इसके अलावा बगेट, जड़ों, घास आदि से निर्मित सामग्री लोगों की आय में बढ़ोतरी कर सकते हैं। बगेट से कलाकृति बनाना काफी आसान और कम खर्च वाला व्यवसाय है। सरकार युवाओं को प्रारंभिक प्रशिक्षण के साथ ही तैयार सामान की बिक्री की व्यवस्था करे, तो काफी लाभ हो सकता है। आर्थिक समृद्धि के लिए हस्तशिल्प कला को बढ़ावा देना जरूरी है। 
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