कुविवि एसएसजे परिसर में लोक साहित्य और भारतीय संस्कृति विषय पर आयोजित दो दिवसीय सेमीनार में वक्ताओं ने लोक गीत और लोक गाथाओं को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बताया। इनके संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास करने पर जोर दिया। सेमीनार नीदरलैंड से पहुंचे ल्यूक रिजविक ने भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए पहले लोक साहित्य के संरक्षण की जरूरत बताई।
इतिहास विभाग द्वारा आयोजित सेमीनार के पहले दिन बतौर मुख्य अतिथि ल्यूक रिजविक ने कहा कि भारतीय संस्कृति में अनेकता में एकता देखने को मिलती है। उन्होंने लोक साहित्य को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसके संरक्षण करने से भारतीय संस्कृति के संरक्षण को और बल मिलेगा। डा. योगेंद्र दत्त ने भारतीय संस्कृति को आध्यात्म से जीवन तक की यात्रा बताते हुए कहा कि लोक जीवन सत्यम शिवम सुन्दरम का व्यवहारिक रूप है।
मुख्य वक्ता मेरठ विवि के डा. केडी शर्मा ने प्राचीन भारतीय संस्कृति को गंगा की अविरल धारा के समान गतिशील बताया। कहा कि परंपराओं को बचाने की कला आदिवासियों से सीखने की जरूरत है। इतिहास, साहित्य और सभ्यता तीनों लोक जीवन से जन्म लेती हैं। सेमीनार के निदेशक प्रो. सीएम अग्रवाल ने भारतीय संस्कृति को विविधताओं एवं विशेषताओं से परिपूर्ण बताया। डा. एसए हामिद ने लोकगीत और लोक गाथाओं को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बताया। इस मौके पर शोध पुस्तिका का भी विमोचन किया गया।
कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं ने सरस्वती वंदना और विश्वविद्यालय का कुलगीत प्रस्तुत किया। प्रो. संजय टम्टा ने सभी का आभार व्यक्त किया। संचालन प्रो. जेएस बिष्ट ने किया। इस अवसर पर प्रो. आरएस पथनी, प्रो. देव सिंह पोखरिया, प्रो. केएन पांडे, प्रो. शेर सिंह बिष्ट, डॉ. चंद्र सिंह चौहान, डॉ. वीडीएस नेगी, प्रो. एचबी कोठारी, डॉ. प्रेमलता पंत, प्रो. इला साह, डॉ. रेनू प्रकाश, प्रो. आराधना शुक्ला, डॉ. रीना उनियाल, प्रो. शेखर चंद्र जोशी आदि मौजूद थे। मौजूद रहे।