आजादी मिली और फिर अपना राज्य भी बन गया, लेकिन विकास खंड के दूरस्थ गांव लालूरी गांव की समस्याएं हल नहीं हुईं। लोग आज भी सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। जब लोगों को कोई उम्मीद नहीं रह गई तो उन्होंने गांव छोड़ना ही मुनासिब समझा। हालत यह है कि रोजगार और जरूरी सुविधाओं के अभाव में करीब पचास प्रतिशत से अधिक परिवार गांव छोड़कर जा चुके हैं। गांव में जो लोग बचे भी हैं उनमें अधिकांश बुजुर्ग ही हैं। बंजर खेत और झाड़ियों से घिरे खाली पड़े मकान पलायन की दास्तां को बयां कर रहे हैं।
चौखुटिया-मासी मोटर मार्ग में स्थित भगोती से छह किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित लालूरी में सड़क नहीं होने से लोगों को खासी दिककतों का सामना करना पड़ रहा है। कई बार तो मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। आसपास कोई अस्पताल नहीं हैं। बैंक संबंधी कार्यों के लिए भी लोगों को मासी और चौखुटिया जाना पड़ता है। गांव में प्राथमिक पाठशाला और जूनियर हाईस्कूल तो हैं, लेकिन इससे आगे की शिक्षा के लिए पटलगांव जाना पड़ता है। जंगल का रास्ता होने के चलते जंगली जानवरों का भय बना रहता है जिसके चलते बच्चों को लाने-ले जाने अभिभावकों को साथ जाना पड़ता है। साग सब्जियों और आम उत्पादन के लिए प्रसिद्ध गांव में विपणन की व्यवस्था नहीं होने से काश्तकारों को लागत के अनुपात में दाम नहीं मिल पाते हैं।
तमाम तरह की समस्याओं से जूझते लोगों का गांव से मोह भंग होता जा रहा है। हालत यह है कि 65 परिवारों में से 35 परिवार पलायन कर चुके हैं बचे हुए परिवारों में भी गांव में सिर्फ बुजुर्ग ही रहते हैं। ग्राम प्रधान गायत्री देवी हर तरफ गुहार लगाने के बावजूद सड़क नहीं बनने से नाराज हैं। उनका कहना है कि यदि शीघ्र ही सड़क निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो फिर जनता विधानसभा चुनाव में सबक सिखाएगी।
पूर्व प्रधान दुर्गासिंह का कहना है कि सड़क को लेकर ग्रामीणों को सिर्फ आश्वासन ही मिलते रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के रवैये को देखते हुए लोग खुद को ठगा सा महसूस करते हैं। गांव के युवा विपिन शर्मा का कहना है कि रोजगार की तलाश में पलायन कर गए नौजवान अपने बच्चों को गांव में रखना चाहते हैं, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य व सड़क जैसी मूलभूत समस्याओं का निदान नहीं होने से वह भी मजबूर हैं।