अल्मोड़ा में पर्यावरण संरक्षण कार्यशाला
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अल्मोड़ा। विश्व मरूस्थल प्रतिरोध दिवस पर गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण, सतत विकास संस्थान कोसी-कटारमल में हुई कार्यशाला में संस्थान के निदेशक डा. पीतांबर प्रसाद ध्यानी ने कहा कि विश्व में तेज रफ्तार से जमीन मरुस्थल में बदलती जा रही है। सभी देश इस समस्या से प्रभावित हैं। इसका समाधान खोजना जरूरी है। उन्होंने कहा जमीन का सुचारू उपयोग और रखरखाव आवश्यक है।
डा. ध्यानी ने कहा कि संस्थान ने अब तक बंजर भूमि पुनरुत्थान पर जितने भी पर्यावरण तकनीकें, मॉडल विकसित किए हैं उन्हें सभी हिमालयी राज्यों के साथ ही अन्य राज्यों में फैलाना आवश्यक है। कार्यशाला समन्वयक वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. आरसी सुंदरियाल ने बताया कि विश्व में करीब 32 प्रतिशत भू भाग मरुस्थल की चपेट में है। जिससे करीब 1.5 अरब लोग प्रभावित है।
देश में करीब 10.5 करोड़ हेक्टेयर भूमि जो कि देश का लगभग 32.07 प्रतिशत भू भाग भूमि क्षरण से प्रभावित है। विश्व में प्रति मिनट करीब 23 हेक्टेयर भूमि का क्षरण हो रहा है। यदि भविष्य में इसी रफ्तार से भूमि क्षरित होती रही तो कृषि उत्पादन प्रभावित होने के साथ-साथ बहुत बड़ी जनसंख्या पर विस्थापन का खतरा मंडरा सकता है।
डा. संदीपन मुखर्जी ने बताया कि हिमालयी राज्य जलवायु परिवर्तन प्रभावित होने के कारण बताए। वक्ताओं ने कहा कि मानव कार्य कलाप से भूमि मरुस्थलीय होती जा रही है और जलवायु परिवर्तन तेजी से बढ़ रहा है। इस मौके पर पलायन रोकने, वनीकरण के लिए उपयुक्त पौधों का चुनाव, पानी, मिट्टी का संरक्षण, बंजर भूमि का विकास, जैविक खेती पर चर्चा की गई।
संचालन संस्थान के वैज्ञानिक डा. आरके सिंह और डा.आरसी प्रसाद ने संयुक्त रूप से किया। कार्यशाला में डा. डीएस रावत आदि मौजूद थे। एनडीटीवी के सुशील बहुुगुणा ने जंगल के दावेदार नामक एक डाक्यूमेंट्री दिखाई।