दन्यां (जागेश्वर)। अमर उजाला द्वारा जागेश्वर विधानसभा के दन्यां कस्बे में आयोजित चुनावी परिचर्चा में लोगों ने बेबाकी से अपनी बातें रखी। यह कस्बा जनरल स्व. बीसी जोशी का पैतृक गांव होने के साथ ही धौलादेवी ब्लॉक का प्रमुख कस्बा है। प्रसिद्ध जागेश्वर धाम भी इसी विधानसभा क्षेत्र में स्थित है। जागेश्वर धाम के नाम पर ही इस विधानसभा का नामकरण हुआ।
परिचर्चा में वक्ताओं ने शिक्षा व्यवस्था, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं, पलायन, जंगली जानवरों की समस्या आदि पर विचार रखे। लोगों ने कहा कि ब्लाक स्तर पर अच्छी शिक्षा व्यवस्था, सुविधायुक्त अस्पताल स्थापित किए जाने चाहिए ताकि लोगों को इन बुनियादी सुविधाओं के लिए गांव न छोड़ने पड़ें। लोगों ने कहा कि सरकारें चुनाव बाद भले ही जन सरोकारों के मुद्दों को खास जगह नहीं दें लेकिन चुनाव के समय उम्मीदवारों से क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए अवश्य आश्वासन लेंगे।
पृथक राज्य आंदोलन के दौरान लोगों ने अपना राज्य बन जाने पर बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सभी को रोजगार मुहैया होने के सपने देखे थे लेकिन राज्य बनने के सोलह साल बाद भी जनाकांक्षा पूरी होने के बजाय धूमिल पड़ती जा रही हैं। शिक्षण व्यवस्था की बदहाल स्थिति और स्कूलों में शिक्षा के घटते स्तर के चलते गांवों से लोग शहरों की ओर पलायन रहे हैं।
अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए भी अनेक लोग गांवों से पलायन कर रहे हैं। साथ ही जंगली जानवरों के आतंक से निजात मिले बगैर खेती को बढ़ावा देना संभव नहीं होगा। कृषि योग्य भूमि तेजी से बंजर होती जा रही है। जो लोग गांवों में रह कर भी अपने जीवट से कृषि को आजीविका का साधन बनाने में जुटे हैं वह भी जंगली सुअरों और बंदरों के प्रकोप से त्रस्त हैं।
कुमाऊं मंडल विकास निगम के रेस्ट हाउस में हुई परिचर्चा में वक्ताओं ने इन तमाम मुद्दों को उठाया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित गोविंद बल्लभ पंत ने कहा कि बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। क्षेत्र में रोजगार के कोई संसाधन नहीं हैं। युवाओं को रोजगार के लिए मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन करना पड़ता है। गृहिणी, खेती-बाड़ी से जुड़ी कमला जोशी ने कहा कि एक समय था कि पहाड़ के आम परिवार खेती किसानी पर निर्भर थे।
कृषि से ही हर घर में छह महीने तक का अनाज हो जाता था। पिछले दो दशकों से खेतीबाड़ी चौपट हो गई है, जो परिवार अब भी खेती पर निर्भर हैं, उनके सामने अस्तित्व का संकट है। असमय बारिश, जंगली बंदर, सुअर खेती को चौपट कर रहे हैं। किसान जितना बीज बो रहा है, उसकी लागत भी नहीं वसूल हो पाती।
कृषि जोत घटने से पशुपालन भी चौपट हो रहा है। हालत यह है कि आम ग्रामीण भी अब ब्रांडेड कंपनियों के थैली बंद दूध, दही के पैकेटों पर निर्भर हैं। युवा सामाजिक कार्यकर्ता हरीश चंद्र जोशी ने कहा कि अधिकांश कस्बे नगरीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। कस्बों की नियोजित बसासत के लिए कोई भी सरकारी योजना नहीं है। नियोजित विकास के लिए सरकार को कोई ठोस नीति बनानी चाहिए।