पानी ढोते डॉक्टर और वार्ड ब्वाय।
- फोटो : amar ujala
सरकार ने पहाड़ के लोगों को भगवान भरोसे छोड़ रखा है। जीवन के लिए जरूरी सेहत सुविधाओं का हाल देख तो यही लगता है। विकासखंड भैसियाछाना के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र धौलछीना को ही लें यहां एक्स रे, पैथोलॉजी, अल्ट्रासाउंड की सुविधा तो छोड़िए खून, बलगम, यूरीन, कोलेस्ट्राल, ब्लड शुगर जैसी मामूली जांच भी नहीं होती। इसके लिए भी 35 किमी दूर अल्मोड़ा जाना पड़ता है। पानी की समस्या इतनी गंभीर है कि यहां तैनात डॉक्टर और वार्ड ब्याय को दिन में दो बार दूरदराज से पानी ढोना पड़ रहा है।
लगभग ढाई करोड़ रुपये की लागत से बना सीएचसी भवन रेफरल सेंटर बन गया है। 15 साल बीत जाने के बाद भी अस्पताल को सीएचसी का दर्जा नहीं मिल सका है। 2004 में अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का उच्चीकरण कर 2 करोड़ 47 लाख रुपये की लागत से यहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के भवन का निर्माण कराया गया था। 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने भवन का लोकार्पण किया, लेकिन तब से पांच मुख्यमंत्री बदल चुके हैं पर नहीं बदली तो अस्पताल की बदहाली।
प्रसव के समय इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाओं का यहां अभाव है। नवजात शिशु केयर यूनिट नहीं होने से कभी कभार नवजात बच्चे की जान पर बन आती है। स्वास्थ्य केंद्र में एक महिला डॉक्टर थी, लेकिन वह पीजी कोर्स करने चले गई हैं, स्टाफ नर्स भी नहीं है। तब से यहां प्रसव नहीं हो रहे।
स्वच्छक और चौकीदार का पद काफी समय से खाली है। अस्पताल में 108 एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं है। जरूरत के समय 30 किमी दूर सेराघाट या 35 किमी दूर अल्मोड़ा से एंबुलेंस बुलानी पड़ती है। अस्पताल में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। डॉक्टर और वार्ड ब्याय खुद दूर दराज से पानी ढोने को मजबूर हैं।